संक्रीड़नार्थं कुन्जाश्च कृताश्च विविधाः प्रभोः ।
सहस्र संख्यकाऽसंख्या: कान्तया कान्त्याभत्र्सित लोककाः ॥
- सनत्कुमार संहिता (31.25)
श्रीकृष्ण के विहार के लिये विविध प्रकार की कुजें हैं। यद्यपि ये असंख्य हैं, तो भी स्थूल रूप से इनकी संख्या लगभग एक हजार है। ये कुञ्जे इतनी सुन्दर हैं कि इनकी कान्तियों से अन्य लोकों की कान्तियों का तिरस्कार हो रहा है ।
सहस्र संख्यकाऽसंख्या: कान्तया कान्त्याभत्र्सित लोककाः ॥
- सनत्कुमार संहिता (31.25)
श्रीकृष्ण के विहार के लिये विविध प्रकार की कुजें हैं। यद्यपि ये असंख्य हैं, तो भी स्थूल रूप से इनकी संख्या लगभग एक हजार है। ये कुञ्जे इतनी सुन्दर हैं कि इनकी कान्तियों से अन्य लोकों की कान्तियों का तिरस्कार हो रहा है ।

