कहि न जाय मुखसौं कछू स्याम-प्रेम की बात - रसिक वाणी

कहि न जाय मुखसौं कछू स्याम-प्रेम की बात - रसिक वाणी

कहि न जाय मुखसौं कछू स्याम-प्रेम की बात।
नभ जल थल चर अचर सब स्यामहि स्याम दिखात॥ [1]
ब्रह्म नहीं, माया नहीं, नहीं जीव, नहि काल।
अपनीहू सुधि ना रही, रह्यो एक नँदलाल॥ [2]
को कासों केहि विधि कहा, कहै हृदैकी बात।
हरि हेरत हिय हरि गयो हरि सर्वत्र लखात॥ [3]

- रसिक वाणी

श्याम का यह प्रेम ऐसा है जिसे मुख से कहना असम्भव है। आकाश, जल, पृथ्वी, चल-अचल जीव सभी श्याम के रंग में रंगे हुए प्रतीत होते हैं। [1]

न अब मैं रचयिता ब्रह्मा को जानता हूं, न माया को, न जीव को, न काल को। अब मुझे अपनी ही सुधि नहीं है, अब मेरे हृदय में एक नंदलाल बसे हैं। [2]

अब इस हृदय की बात किसको बतायी जाए, कोई बचा ही नहीं है। वास्तव में अब कोई रहस्य रह ही नहीं गया है। हरि को निहारते ही हृदय मानो अपना रहा ही नहीं। अब हरि ही सर्वत्र दिखायी दे रहे हैं। [3]