समन-सेज, पौढे, दोऊ, परिरंभन सुख लेत ।
हँसि हँसि भगवत रसिक कौं, फिरि फिरि चुंबन देत॥
- श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (17)
सुमन-सेज, अर्थात् पुष्प-शैया पर विराजे श्री युगल इस समय आलिंगन-सुख का आस्वादन कर रहे हैं। इस परम सुखमय लीला-समायोजन की परिचर्या पर प्रसन्न होकर वे नित्य ही सखी श्री भगवत-अलि को बार-बार चुंबन-प्रसाद प्रदान कर रहे हैं।
हँसि हँसि भगवत रसिक कौं, फिरि फिरि चुंबन देत॥
- श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (17)
सुमन-सेज, अर्थात् पुष्प-शैया पर विराजे श्री युगल इस समय आलिंगन-सुख का आस्वादन कर रहे हैं। इस परम सुखमय लीला-समायोजन की परिचर्या पर प्रसन्न होकर वे नित्य ही सखी श्री भगवत-अलि को बार-बार चुंबन-प्रसाद प्रदान कर रहे हैं।

