(राग सारंग)
वन की लीला लालहिं भावै ।
पत्र प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं नख सिख प्रिया जनावै ।। [1]
सकुच न सकत प्रकट परिरंभन अलि लंपट दुरि धावै ।
संभ्रम देति कुलकि कल कामिनि रति रन कलह मचावै ।। [2]
उलटी सबै समझि नैंननि में अंजन रेख बनावै ।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनी स्याम कहावै ।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (47)
श्रीलालजी को वन की लीला बड़ी प्यारी लगती है, तभी तो उन्हें वहाँ के फूल पत्तों पर पड़े हुए प्रति बिम्बों में भी नख सिख प्रिया रूप ही ज्ञात होता रहता है । [1]
वे ( पत्र प्रसूनों के प्रतिबम्ब पर प्रकट प्रिया प्रतिबिम्ब को देखकर भी ) संकोच वश प्रकट रूप से परिरम्भण कर नहीं सकते तब रस लम्पट भ्रमर ( अलि ) का रूप धारण कर छिप छिप कर दौड़ते हैं ; ( उनके श्रीमुख कमल के रस का पान करने के लिये ) किन्तु सुन्दरी कामिनि ( श्रीराधा ) चञ्चलता पूर्वक चमक कर उन्हें फिर फिर विशेष भ्रम में डाल देती है इस प्रकार निरन्तर एक ) रति रण का कलह मचा रही है । [2]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र ( महाप्रभु सखी रूप से अपनी सहचरियों के प्रति ) कहते हैं- सखियो ! ( आज श्याम सुन्दर की आँखे प्रिया रूप की वास्तविकता को पहचानने में बड़ा धोखा खा रही हैं , अतः वे ) अपनी सारी समझों को उलटी ( विपरीत ) ही मानकर ( आँखों के भ्रम को मिटाने के लिये कि जाने इनमें ही कोई त्रटि तो नहीं है , अपनी ) आँखों में अंजन रेखा बनाते हैं । इसी से हे सजनी स्पष्ट है कि प्रीति – रीति वश स्याम यही ( ऐसी ही भाव मग्न श्याम ) कहलाता है ( कि जिसे अपने समक्ष दर्शन पर भी विश्वास न होकर भ्रम हो रहा है ।”)
वन की लीला लालहिं भावै ।
पत्र प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं नख सिख प्रिया जनावै ।। [1]
सकुच न सकत प्रकट परिरंभन अलि लंपट दुरि धावै ।
संभ्रम देति कुलकि कल कामिनि रति रन कलह मचावै ।। [2]
उलटी सबै समझि नैंननि में अंजन रेख बनावै ।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनी स्याम कहावै ।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (47)
श्रीलालजी को वन की लीला बड़ी प्यारी लगती है, तभी तो उन्हें वहाँ के फूल पत्तों पर पड़े हुए प्रति बिम्बों में भी नख सिख प्रिया रूप ही ज्ञात होता रहता है । [1]
वे ( पत्र प्रसूनों के प्रतिबम्ब पर प्रकट प्रिया प्रतिबिम्ब को देखकर भी ) संकोच वश प्रकट रूप से परिरम्भण कर नहीं सकते तब रस लम्पट भ्रमर ( अलि ) का रूप धारण कर छिप छिप कर दौड़ते हैं ; ( उनके श्रीमुख कमल के रस का पान करने के लिये ) किन्तु सुन्दरी कामिनि ( श्रीराधा ) चञ्चलता पूर्वक चमक कर उन्हें फिर फिर विशेष भ्रम में डाल देती है इस प्रकार निरन्तर एक ) रति रण का कलह मचा रही है । [2]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र ( महाप्रभु सखी रूप से अपनी सहचरियों के प्रति ) कहते हैं- सखियो ! ( आज श्याम सुन्दर की आँखे प्रिया रूप की वास्तविकता को पहचानने में बड़ा धोखा खा रही हैं , अतः वे ) अपनी सारी समझों को उलटी ( विपरीत ) ही मानकर ( आँखों के भ्रम को मिटाने के लिये कि जाने इनमें ही कोई त्रटि तो नहीं है , अपनी ) आँखों में अंजन रेखा बनाते हैं । इसी से हे सजनी स्पष्ट है कि प्रीति – रीति वश स्याम यही ( ऐसी ही भाव मग्न श्याम ) कहलाता है ( कि जिसे अपने समक्ष दर्शन पर भी विश्वास न होकर भ्रम हो रहा है ।”)

