वृन्दावन, वृन्दावन, वृन्दावन कहि रे ।
वृन्दावन-रज की अब, सरन बेगि गहि रे ॥ [1]
भटकै जिन देस देस, वेस जिन लजावै ।
कुंजन के कौनें परयौ जुगल क्यों न गावै ॥ [2]
भलो बन्यौ दाव यौं ही, आव जिनि गवांवै ।
छुटि जैहै तनक मैं तन, पाछैं पछितावै ॥ [3]
चतुर तोहि जानिहौं जो, चेति है सबेरौ ।
अब ही करि लेहि क्यों न, आपनौं निबेरौ ॥ [4]
राखि मन भरोसौ तोहि, पोखिहैं श्रीराधा ।
किशोरी दृढ़ चरन सरन, मिटि हैं सब बाधा ॥ [5]
- श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (8)
हे जीव! "वृंदावन वृंदावन वृंदावन" कह, और श्री वृंदावन धाम की शरण शीघ्र ग्रहण कर । [1]
अपनी सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु क्यों तू देश देश भटक रहा है, और अंत में दुःख को प्राप्त करके भी तुझे लज्जा नहीं आ रही । अब तू वृंदावन के किसी कुंज के कोने में बैठकर युगल सरकार का गुणगान क्यों नहीं करता? [2]
सर्वोच्च भाग्य तभी जागृत हो जाता है जब जीव श्री वृंदावन धाम की शरण में आ जाता है । यह मानव जीवन क्षणभंगुर है, और यदि इस अनमोल रतन रूपी मानव देह का उपयोग नहीं किया तो निश्चित ही तुझे बाद में पछताना पड़ेगा । [3]
बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो इस सांसारिक मोह को स्वप्न की भाँति त्याग कर वृंदावन के रस में अपने मन को डुबा दे और इसी क्षण वृंदावन की शरण ग्रहण कर अपनी बिगड़ी बना ले । [4]
अपने मन में यह पूर्ण भरोसा रख कि निश्चित ही श्री राधा तेरी रक्षा कर तेरे समस्त भावों का पोषण करेंगी । श्री किशोरी अलि कहते हैं, "श्री किशोरीजी के चरण कमलों में दृढ़ विश्वास रखने से ही समस्त बाधाएं स्वतः ही दूर हो जाती हैं"। [5]
वृन्दावन-रज की अब, सरन बेगि गहि रे ॥ [1]
भटकै जिन देस देस, वेस जिन लजावै ।
कुंजन के कौनें परयौ जुगल क्यों न गावै ॥ [2]
भलो बन्यौ दाव यौं ही, आव जिनि गवांवै ।
छुटि जैहै तनक मैं तन, पाछैं पछितावै ॥ [3]
चतुर तोहि जानिहौं जो, चेति है सबेरौ ।
अब ही करि लेहि क्यों न, आपनौं निबेरौ ॥ [4]
राखि मन भरोसौ तोहि, पोखिहैं श्रीराधा ।
किशोरी दृढ़ चरन सरन, मिटि हैं सब बाधा ॥ [5]
- श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (8)
हे जीव! "वृंदावन वृंदावन वृंदावन" कह, और श्री वृंदावन धाम की शरण शीघ्र ग्रहण कर । [1]
अपनी सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु क्यों तू देश देश भटक रहा है, और अंत में दुःख को प्राप्त करके भी तुझे लज्जा नहीं आ रही । अब तू वृंदावन के किसी कुंज के कोने में बैठकर युगल सरकार का गुणगान क्यों नहीं करता? [2]
सर्वोच्च भाग्य तभी जागृत हो जाता है जब जीव श्री वृंदावन धाम की शरण में आ जाता है । यह मानव जीवन क्षणभंगुर है, और यदि इस अनमोल रतन रूपी मानव देह का उपयोग नहीं किया तो निश्चित ही तुझे बाद में पछताना पड़ेगा । [3]
बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो इस सांसारिक मोह को स्वप्न की भाँति त्याग कर वृंदावन के रस में अपने मन को डुबा दे और इसी क्षण वृंदावन की शरण ग्रहण कर अपनी बिगड़ी बना ले । [4]
अपने मन में यह पूर्ण भरोसा रख कि निश्चित ही श्री राधा तेरी रक्षा कर तेरे समस्त भावों का पोषण करेंगी । श्री किशोरी अलि कहते हैं, "श्री किशोरीजी के चरण कमलों में दृढ़ विश्वास रखने से ही समस्त बाधाएं स्वतः ही दूर हो जाती हैं"। [5]

