किशोरी ये अभिलाषा मन में - श्री सरस माधुरी

किशोरी ये अभिलाषा मन में - श्री सरस माधुरी

किशोरी ये अभिलाषा मन में ।
सेवत रहूँ श्री रजधानी श्री मत वृन्दावन में ॥ [1]
रसिकन संग रंग सो विचरो, यमुना पुलिन लतन में ।
राधे नाम रटो रसना सो प्रेम पुलक हू तन में ॥ [2]
निशाअरु दिवस निरंतर मेरौ, बीते भाव भजन में ।
सरस माधुरी वास दीजिये, निज परिकर अलियन में ॥ [3]

- श्री सरस माधुरी

हे किशोरी जी, मेरे मन में अभिलाषा है कि मैं श्री वृंदावन धाम जैसी रजधानी में आपकी नित्य सेवा करूँ । [1]

मैं सदा रसिक संतों के संग, यमुना के तट पर लताओं के मध्य, तुम्हारे प्रेम में रँग कर विचरण करूँ । ऐसी कृपा करो कि "राधे" नाम के रटने मात्र से ही मेरे तन में पुलक हो जाए । [2]

ऐसी कृपा हो कि मेरी हर रात्रि, हर दिन, हर पल, हर भाव आपके भजन में ही व्यतीत हो । श्री सरस माधुरी कहते हैं, "कृपया कर मुझे भी अपने निज परिकर सखियों में वास प्रदान कीजिए"। [3]