भूमि सुभग तरु लता छवि, सुधि बुधि सब हर लेत ।
अटक परे चित चीकनो, कहूँ चलत नहिं देत॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (13)
श्री वृन्दावन धाम की भूमि मधुर है, वृक्षों और लताओं की छवि देख सुध-बुध खो जाती है। यह वृन्दावन का ही प्रभाव है कि मन ऐसा अटक जाता है, मानो वृन्दावन के अतिरिक्त कहीं और इसकी गति ही नहीं रह जाती।
अटक परे चित चीकनो, कहूँ चलत नहिं देत॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (13)
श्री वृन्दावन धाम की भूमि मधुर है, वृक्षों और लताओं की छवि देख सुध-बुध खो जाती है। यह वृन्दावन का ही प्रभाव है कि मन ऐसा अटक जाता है, मानो वृन्दावन के अतिरिक्त कहीं और इसकी गति ही नहीं रह जाती।

