चन्द चकोर की चाह करै - श्री घनानंद जी

चन्द चकोर की चाह करै - श्री घनानंद जी

(सवैया)
चन्द चकोर की चाह करै, ‘घनआनन्द’ स्वाति पपीहा कौं धावै। [1]
त्यौं त्रसरैनि के ऐन बसै रबि, मीन पै दीन ह्व सागर आवै॥ [2]
मोसों तुम्हैं सुनो जान कृपानिधि, नेह निबाहिबौ यौं छवि पावै। [3]
ज्यौं अपनी रुचि राचि कुबेर सु, रंकहि लै निज अंक बसावैं॥ [4]

- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (202)

हे प्रियतम! कल्पना करो, कैसी अद्भुत लीला होगी यदि चंद्रमा चकोर के पीछे भागे और स्वाति का मेघ पपीहे के पास स्वयं आ पहुँचे। [1]

यदि सूर्य त्रसरेणु [सूर्य को चाहने वाली स्त्री] के आँगन में निवास करे और मछली के पास सागर विनम्रता से आ जाए। [2]

हे कृपासागर श्रीकृष्ण! मेरे संग आपका प्रेम निभाना वैसा ही सुंदर होगा। [3]

जैसे कुबेर अपनी इच्छा से किसी दीन-दरिद्र को गोद में बिठा ले। [4]