(राग रामग्री)
माई हौं गिरधरन के गुन गाऊँ ।
मेरे तो ब्रत यहै निरंतर, और न रुचि उपजाऊँ ॥ [1]
खेलन ऑंगन आउ लाडिले, नेकहु दरसन पाऊँ।
'कुंभनदास’ हिलग के कारन, लालचि मन ललचाऊँ ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (229)
अरे सखी! मैं तो बस गिरिधर का ही गुणगान करता हूँ । मेरा तो बस यही व्रत है, मुझे और कुछ भी रुचिकर नहीं है । [1]
जब मेरा लाडलो श्याम सुंदर खेलने आता है तो मैं उसका एक दर्शन पाकर ही धन्य हो जाता हूँ । श्री कुंभनदास जी कहते हैं कि श्याम सुंदर से मेरा प्रेम सम्बंध होने के कारण मेरा लालची मन ललचाता रहता है । [2]
माई हौं गिरधरन के गुन गाऊँ ।
मेरे तो ब्रत यहै निरंतर, और न रुचि उपजाऊँ ॥ [1]
खेलन ऑंगन आउ लाडिले, नेकहु दरसन पाऊँ।
'कुंभनदास’ हिलग के कारन, लालचि मन ललचाऊँ ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (229)
अरे सखी! मैं तो बस गिरिधर का ही गुणगान करता हूँ । मेरा तो बस यही व्रत है, मुझे और कुछ भी रुचिकर नहीं है । [1]
जब मेरा लाडलो श्याम सुंदर खेलने आता है तो मैं उसका एक दर्शन पाकर ही धन्य हो जाता हूँ । श्री कुंभनदास जी कहते हैं कि श्याम सुंदर से मेरा प्रेम सम्बंध होने के कारण मेरा लालची मन ललचाता रहता है । [2]

