(राग विहागरौ)
सखी री मन के स्याम सुखदाई ।
प्रगट स्याम सों कौन मिलै अब बिछुरै होत दुखदाई ।। [1]
निसि-दिन पलक एक नहिं छोडत पोसत मन के भाय ।
अंतरगत बिहरत जु दुराने भेंटत कंठ लगाई ।। [2]
सोवत जागत संग ही डोलत जितहीं तित मन जाई ।
इन्हैं उन्हैं यह भेद कहा है मदन तेज अधिकाई ।। [3]
विरह दुख होत नहिं जातें ये चतुरन के राई ।
श्रीरसिकबिहारी सो कहत बिहारिनि मिलिये बोल हराई ।। [4]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)
हे सखी, मन में जो श्री नित्यबिहारी बिहारिनी जु निरंतर विहार कर रहे हैं, वे ही श्याम सदाकाल सुखदाई हैं । प्रकट श्याम से हर क्षण कैसे मिल सकते हैं और उनका वियोग भी दुःखदाई है । [1]
हमारे हृदय वाले श्याम तो दिन रात, एक क्षण भी हमें छोड़ कर कहीं नहीं जाते एवं नित्य ही हमारे मन का पोषण करते हैं । सबसे छिपे हुए हमारे अंतर्गत हृदय में कंठ से कंठ लगाए विहार करते रहते हैं । [2]
सोते जागते जहाँ जहाँ हमारा मन जाता है वह श्याम हमारे साथ साथ डोलता है । यदि कोई कहे कि प्रकट ठाकुर और हमारे हृदय के श्याम में कोई भेद है तो हम स्पष्ट करके कहते हैं कि इनका मदन तेज अति अधिक बढ़ता रहता है और यह काम केलि रस को छिन मात्र को नहीं त्याग सकते हैं । [3]
ऐसे चतुर शिरोमणि श्यामसुंदर का विरह दुःख स्पर्श भी नहीं करता है । हमारी प्राणेश्वरी नित्य विहारिनी जू श्री बिहारी जू से कहती हैं कि सदा मौन होकर हम तुम दोनों खेलते रहते हैं । [4]
सखी री मन के स्याम सुखदाई ।
प्रगट स्याम सों कौन मिलै अब बिछुरै होत दुखदाई ।। [1]
निसि-दिन पलक एक नहिं छोडत पोसत मन के भाय ।
अंतरगत बिहरत जु दुराने भेंटत कंठ लगाई ।। [2]
सोवत जागत संग ही डोलत जितहीं तित मन जाई ।
इन्हैं उन्हैं यह भेद कहा है मदन तेज अधिकाई ।। [3]
विरह दुख होत नहिं जातें ये चतुरन के राई ।
श्रीरसिकबिहारी सो कहत बिहारिनि मिलिये बोल हराई ।। [4]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)
हे सखी, मन में जो श्री नित्यबिहारी बिहारिनी जु निरंतर विहार कर रहे हैं, वे ही श्याम सदाकाल सुखदाई हैं । प्रकट श्याम से हर क्षण कैसे मिल सकते हैं और उनका वियोग भी दुःखदाई है । [1]
हमारे हृदय वाले श्याम तो दिन रात, एक क्षण भी हमें छोड़ कर कहीं नहीं जाते एवं नित्य ही हमारे मन का पोषण करते हैं । सबसे छिपे हुए हमारे अंतर्गत हृदय में कंठ से कंठ लगाए विहार करते रहते हैं । [2]
सोते जागते जहाँ जहाँ हमारा मन जाता है वह श्याम हमारे साथ साथ डोलता है । यदि कोई कहे कि प्रकट ठाकुर और हमारे हृदय के श्याम में कोई भेद है तो हम स्पष्ट करके कहते हैं कि इनका मदन तेज अति अधिक बढ़ता रहता है और यह काम केलि रस को छिन मात्र को नहीं त्याग सकते हैं । [3]
ऐसे चतुर शिरोमणि श्यामसुंदर का विरह दुःख स्पर्श भी नहीं करता है । हमारी प्राणेश्वरी नित्य विहारिनी जू श्री बिहारी जू से कहती हैं कि सदा मौन होकर हम तुम दोनों खेलते रहते हैं । [4]

