(राग देवगंधार)
ऐसो कब करिहौ मन मेरौ ।
कर करुआ कामरि कांधे पै, कुंजन मांझ बसेरौ ।। [1]
ब्रजवासिन के टूक भूख में, घर घर छाछ महेरौ ।
भूख लगै जब मांग खाऊँगो, गनौं न सांझ सबेरौ ।। [2]
रास विलास वृत्ति करि पाऊँ, मेरे खूँट न खेरौ ।
व्यासदास होय वृन्दावन में, रसिक जनन को चेरौ ।। [3]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (102)
हे वृंदावन! ऐसा मेरा मन कब करोगे जब में हाथ में करुवा और कन्धे पर कमरिया (छोटा कम्बल) रखकर वृन्दावन की कुंजों के मध्य में बस जाऊँगा । [1]
जब मुझे भूख लगे तो में व्रजवासियों के टूक पाऊँ, एवं छाछ और महेरी (दलिया) माँगकर भूख को शांत कर लूँ और सुबह-शाम की चिन्ता न करूँ अर्थात जब भी मधुकरी मिल जाय तभी अपनी उदर पूर्ति कर लूँ। [2]
ऐसी कृपा हो कि युगल का रास विलास ही मेरे जीवन का एक मात्र आधार बन जाये, क्योंकि श्री वृंदावन के अतिरिक्त अब मेरा कोई निवास स्थान शेष नहीं रह गया है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अब मेरी पहचान यही है कि मैं वृंदावन में अब रसिक जनों का दास हूँ । [3]
ऐसो कब करिहौ मन मेरौ ।
कर करुआ कामरि कांधे पै, कुंजन मांझ बसेरौ ।। [1]
ब्रजवासिन के टूक भूख में, घर घर छाछ महेरौ ।
भूख लगै जब मांग खाऊँगो, गनौं न सांझ सबेरौ ।। [2]
रास विलास वृत्ति करि पाऊँ, मेरे खूँट न खेरौ ।
व्यासदास होय वृन्दावन में, रसिक जनन को चेरौ ।। [3]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (102)
हे वृंदावन! ऐसा मेरा मन कब करोगे जब में हाथ में करुवा और कन्धे पर कमरिया (छोटा कम्बल) रखकर वृन्दावन की कुंजों के मध्य में बस जाऊँगा । [1]
जब मुझे भूख लगे तो में व्रजवासियों के टूक पाऊँ, एवं छाछ और महेरी (दलिया) माँगकर भूख को शांत कर लूँ और सुबह-शाम की चिन्ता न करूँ अर्थात जब भी मधुकरी मिल जाय तभी अपनी उदर पूर्ति कर लूँ। [2]
ऐसी कृपा हो कि युगल का रास विलास ही मेरे जीवन का एक मात्र आधार बन जाये, क्योंकि श्री वृंदावन के अतिरिक्त अब मेरा कोई निवास स्थान शेष नहीं रह गया है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अब मेरी पहचान यही है कि मैं वृंदावन में अब रसिक जनों का दास हूँ । [3]

