कालिन्दी – तट कुञ्ज-मंदिरगतो योगीन्द्र वद्यत्पद ज्योतिर्ध्यान परः सदा जपति यां प्रेमाश्रुपूर्णो हरिः ।
केनाप्यद्भुतमुल्ल सद्रतिरसानन्देन सम्मोहिता, सा राधेति सदा हृदि स्फुरतु मे विद्यापरा द्वयक्षरा ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (95)
योगीन्द्रों के समान जिनकी चरण-ज्योति के ध्यान-परायण होकर प्रेमाश्रु-पूर्ण नेत्र तथा गद्-गद् वाणी से कालिन्दी-तट के किसी निकुञ्ज मन्दिर में विराजमान् श्रीहरि भी स्वयं जिस नाम का जप करते हैं। वही अनिवंचनीय अद्भुत उल्लासमय एवं रति-रसानन्द से सम्मोहित 'राधा' इन दो अक्षरों की पराविद्या मेरे हृदय में सदा स्फुरित रहे ।
केनाप्यद्भुतमुल्ल सद्रतिरसानन्देन सम्मोहिता, सा राधेति सदा हृदि स्फुरतु मे विद्यापरा द्वयक्षरा ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (95)
योगीन्द्रों के समान जिनकी चरण-ज्योति के ध्यान-परायण होकर प्रेमाश्रु-पूर्ण नेत्र तथा गद्-गद् वाणी से कालिन्दी-तट के किसी निकुञ्ज मन्दिर में विराजमान् श्रीहरि भी स्वयं जिस नाम का जप करते हैं। वही अनिवंचनीय अद्भुत उल्लासमय एवं रति-रसानन्द से सम्मोहित 'राधा' इन दो अक्षरों की पराविद्या मेरे हृदय में सदा स्फुरित रहे ।

