कासी औ प्रयाग द्वारावती कौं निहार आये - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (64)

कासी औ प्रयाग द्वारावती कौं निहार आये - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (64)

कासी औ प्रयाग द्वारावती कौं निहार आये,
ब्रज माँहि आयौ जब आयबौ कहा रह्यौ। [1]
गंगा सिन्धु सरस्वती सरजू में न्हाय आयौ,
जमुना में न्हायौ जब न्हायबो कहा रह्यौ॥ [2]
'लाल बलबीर' ब्रजराज की रंगीली छबि, 
हिये माँहि लायो जब लायबो कहा रह्यौ। [3]
प्रभु प्रसाद पायो सीस संतन कूँ नायो,
श्रीवृन्दावन पायो जब पायबो कहा रह्यौ॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (64)

यदि ब्रज में आने का बनाव बन गया और ब्रज को निहार ही लिया, फिर काशी, प्रयाग और द्वारका आदि को निहारने का क्या प्रयोजन? [1]

यदि यमुना में नहाने का अवसर प्राप्त हो ही गया, फिर गंगा, सिंधु, सरस्वति और सरजू में नहाने से क्या प्रयोजन? [2]

श्री लाल बलबीर जी कहते हैं, यदि ब्रजराज [ब्रज के ठाकुर] की रंगीली छवि को हृदय में बसा ही लिया, फिर अन्य किसी को हृदय में लाने से क्या प्रयोजन? [3]

यदि प्रभु का प्रसाद पा लिया, संतों के चरणों में शीश झुका लिया, और श्री वृंदावन धाम प्राप्त कर लिया, तो अब पाने को रहा ही क्या? [4]