वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (31)

वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (31)

वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ ।
ताकौं तजिये तुरत हीं, वा सम दूरित न कोइ ॥

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (31)

जिस व्यक्ति को वृंदावन की महिमा सुनने में रुचि नहीं होती, उसका संग तुरंत छोड़ देना चाहिए, क्योंकि ऐसे व्यक्ति का संग करना ही महत्त अपराध है जो आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है।