(सवैया)
आज भटू मुरली बट के तट, नंद के साँवरे रास रच्यौ री। [1]
नैननि सैननि बैननि सो नहिं, कोऊ मनोहर भाव बच्यौ री॥ [2]
जद्यपि राखन कौं कुलकानि, सबैं ब्रजबालन प्रान पच्यौ री। [3]
तथापि वा रसखानि के हाथ, बिकानि कौं अंत लच्यौ पै लच्यौ री॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
हे सखी! आज नंदनंदन श्रीकृष्ण यमुना-तट पर वंशीवट के नीचे मधुर मुरली की तान छेड़ते हुए रास रच रहे हैं। [1]
श्यामसुंदर ने अपनी चितवन, संकेत और मधुर वाणी से आनंद की ऐसी वर्षा कर दी कि कोई मोहक भाव शेष नहीं रहा। [2]
प्रथम तो ब्रज की गोपियों ने कुल-लाज निभाने का यत्न किया, परंतु प्रेम-व्याकुल होकर सब व्रत-बंधन तोड़ने पड़े। [3]
श्री रसखान कहते हैं, "अंततः सब अपनी मर्यादाएँ छोड़कर, रस की ख़ान, श्रीकृष्ण के हाथों बिक गईं।" [4]
आज भटू मुरली बट के तट, नंद के साँवरे रास रच्यौ री। [1]
नैननि सैननि बैननि सो नहिं, कोऊ मनोहर भाव बच्यौ री॥ [2]
जद्यपि राखन कौं कुलकानि, सबैं ब्रजबालन प्रान पच्यौ री। [3]
तथापि वा रसखानि के हाथ, बिकानि कौं अंत लच्यौ पै लच्यौ री॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
हे सखी! आज नंदनंदन श्रीकृष्ण यमुना-तट पर वंशीवट के नीचे मधुर मुरली की तान छेड़ते हुए रास रच रहे हैं। [1]
श्यामसुंदर ने अपनी चितवन, संकेत और मधुर वाणी से आनंद की ऐसी वर्षा कर दी कि कोई मोहक भाव शेष नहीं रहा। [2]
प्रथम तो ब्रज की गोपियों ने कुल-लाज निभाने का यत्न किया, परंतु प्रेम-व्याकुल होकर सब व्रत-बंधन तोड़ने पड़े। [3]
श्री रसखान कहते हैं, "अंततः सब अपनी मर्यादाएँ छोड़कर, रस की ख़ान, श्रीकृष्ण के हाथों बिक गईं।" [4]

