गिरिराज उठा कुछ ऊपर को - श्री हरे कृष्ण जी

गिरिराज उठा कुछ ऊपर को - श्री हरे कृष्ण जी

(सवैया)
गिरिराज उठा कुछ ऊपर को, सुरभी मुख में तृण तोड़े खड़ी हैं। [1]
अहो ! कोकिला कंठ भी मौन हुआ, मृगी मोहित सी मन मोड़े खड़ी हैं॥ [2]
‘हरेकृष्ण’ ! कहें किसको किसको, यमुना अपनी गति छोड़े खड़ी हैं। [3]
मनमोहन की मुरली सुनके, रति रम्भा रमा कर जोड़े खड़ी हैं॥ [4]

- श्री हरे कृष्ण जी
 

गिरिराज मानो ऊँचा उठ खड़ा है, और गौएँ ऐसे स्थिर हैं जैसे मुख में चारा तोड़ते-तोड़ते थम गई हों। [1]

कोकिला का मधुर कंठ भी मौन हो गया है, और मृगी भी मोहित होकर स्थिर खड़ी है। [2]

श्री हरे कृष्ण जी कहते हैं—अब क्या-क्या कहें, यमुना भी गति हीन हो गई है। [3]

मनमोहन की मुरली सुनकर रति, रंभा और लक्ष्मी तक हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़ी हैं। [4]