बिहारिनी संग निरंतर मेरें ।
जाकी कृपा लाल रहें वंच्छित जीवत याहि हेरें ।। [1]
निकसि न सकत रूप सागर तें परे प्रेम रस फेरें ।
ऐसी ललित किसोरी प्रीतम कहा जगत के डेरें ।। [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (104)
हमारा प्रेम का सम्बंध केवल अति उदार चूड़ामणि श्री कुंजबिहारिनी प्यारी ज़ू [राधा रानी] से ही है जिनकी कृपा की वांछा नित्य ही श्री लाल जी [श्री कृष्ण] भी करते रहते हैं और इन्हें निहार कर ही जीवित रहते हैं । [1]
जिन श्री राधा का रूप रस सागर निहार निहार कर वह निहाल रहते हैं, कदापि उस सागर से निकल नहीं पाते और प्रेम रस में डूबते रहते हैं । श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि जब ऐसे परम रसीले प्रीतम प्यारी हमारे हैं तो हमें जगत से क्या लेना ? [2]

