कौन भांति तुम रीझौ किशोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (329)

कौन भांति तुम रीझौ किशोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (329)

कौन भांति तुम रीझौ किशोरी ।
ज्यौं रीझौ सोइ करौं कृपानिधि, जहँ लगि चलि है मोरी ॥ [1]
मोहि तौ जतन नयन नहिं सुझत, मन बुधि वेग थक्यौ री ।
'भोरी' सहज कृपालु लाड़िली, आपुन क्यों न कहौ री ॥ [2]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (329)

हे किशोरी जू। मेरे द्वारा क्या कुछ किये जाने पर आप मुझ पर प्रसन्न हो सकती हो ? हे कृपानिधि! आप मुझे वह तरकीब बतायें, जिसके करने से आप प्रसन्न हो जायेंगी। मेरे वश में जहाँ तक होगा, मैं उसे करने का पूरा प्रयास करूंगी । [1] 

मेरी नज़र में तो आपको प्रसन्न करने का कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा है। मेरा मन और मेरी बुद्धि तो कोई युक्ति सोचते-विचारते तुरन्त थकान का अनुभव करने लगती है। श्रहित भोरोसखी जी कहती है कि हे लाड़ली तो सहज रूप से कृपा करने वाली हैं, तो फिर आप स्वयं ही इसका उपाय क्यों नहीं बता देती हो ? [2]