जो सुख लेत सदा व्रजवासी - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (144)

जो सुख लेत सदा व्रजवासी - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (144)

जो सुख लेत सदा व्रजवासी ।
सो सुख स्वपनेहुँ नहिं पावत जे वैकुण्ठ निवासी ।। [1]
ह्वां घर-घर ह्वै रह्यौ खिलौना जगत कहत जाकों अविनासी ।
नागरीदास विशव तैं न्यारी लगि गई लूट हाथ सुखरासी ।। [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (144)
 
जो दिव्य सुख ब्रजवासी सदा प्राप्त करते हैं वह सुख साक्षात वैकुंठ निवासी सपने में भी प्राप्त नहीं कर सकता । [1]

जिस भगवान को पूरा जगत अविनाशी कहता है वह यहाँ ब्रज के घर घर में खिलौना बना रहता है । श्री नागरीदास जी कहते हैं कि यह ब्रज विश्व से न्यारा है, श्री हरि गुरु की कृपा से मानों हमारे हाथ सुखरासी स्वरूप ख़ज़ाना लग गया है । [2]