जाकैं श्री राधा है इष्ट ।
ताही को नित मंगल जग में, सब ही मिटैं अरिष्ट ॥ [1]
राधा नाम समान न कोऊ, मधुर रसन में मिष्ट ।
गुरु-प्रसाद तें रतन अली के, अब जागै हैं दिष्ट ॥ [2]
- श्री रतन अलि
जिसकी श्री राधा इष्ट है बस उसी का ही जग में नित्य मंगल है और उसी के समस्त कष्ट मिट जाते हैं । [1]
श्री राधा नाम की तुलना किसी से नहीं की जा सकती क्यूँकि इसके समान कोई नहीं है और जिस नाम का रस समस्त मधुर रसों में सबसे अधिक सुहावना है । श्री रतन अलि जी कहते हैं की गुरु प्रसाद [कृपा] से अब मेरे सौभाग्यों का उदय हुआ है । [2]
ताही को नित मंगल जग में, सब ही मिटैं अरिष्ट ॥ [1]
राधा नाम समान न कोऊ, मधुर रसन में मिष्ट ।
गुरु-प्रसाद तें रतन अली के, अब जागै हैं दिष्ट ॥ [2]
- श्री रतन अलि
जिसकी श्री राधा इष्ट है बस उसी का ही जग में नित्य मंगल है और उसी के समस्त कष्ट मिट जाते हैं । [1]
श्री राधा नाम की तुलना किसी से नहीं की जा सकती क्यूँकि इसके समान कोई नहीं है और जिस नाम का रस समस्त मधुर रसों में सबसे अधिक सुहावना है । श्री रतन अलि जी कहते हैं की गुरु प्रसाद [कृपा] से अब मेरे सौभाग्यों का उदय हुआ है । [2]

