श्री प्रियादास जी की जीवनी 

श्री प्रियादास जी की जीवनी 

जन्म :
भक्त प्रवर श्री प्रियादास जी का जन्म सूरत-नगर के राजपुरा नामक ग्राम में हुआ था। इनका जन्म 1683 से कुछ पूर्व का अनुमानित है। श्री नाभादास जी कृत भक्तमाल श्री प्रियादास जी कृत भक्ति रसबोधिनी टीका में टीका की सम्पूर्णता का समय 1712 दिया गया है। श्री प्रियादास कृत-रसिक मोहिनी नामक ग्रंथ में भी ग्रंथ रचना का समय 1737 उल्लिखित है। इस विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि श्री प्रियादास जी का विद्यमान काल सं. 1683 के कुछ पूर्व से 1737 या इसके कुछ बाद तक हो सकता है। श्री प्रियादास जी के पिता का नाम श्री वासुदेव था और माता का नाम श्रीमती गंगाबाई था। 
 
आध्यात्मिक जीवन :
अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही श्री प्रियादास जी वृन्दावन आ गये थे और भक्त प्रवर श्री मनोहरदास जी से वैष्णवी दीक्षा को प्राप्त किया था। आचार्य श्री गोपाल भट्ट के शिष्यों में श्री निवासाचार्य जी सुप्रसिद्ध रहे हैं। श्री मनोहरदास जी इन्हीं श्री निवासाचार्य जी के शिष्य थे। शिष्य होने के अन्तर इन्होंने गलता (जयपुर) की यात्रा की, जहाँ इन्हें भक्तमाल की टीका करने की प्रेरणा मिली। इसमें 634 कवित्त हैं। इस टीका का रचनाकाल 1712 है।
श्री प्रियादास जी भक्तमाल की कथा भी अत्यन्त सरलतापूर्ण ढंग से कहते थे। ब्रजभाषा में इनकी रचनाएं अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि की रही हैं। इन रचनाओं में जहाँ एक ओर सांप्रदायिक उपासना से सम्बन्धित सिद्धांतों का निरूपण किया गया है, वहीं दूसरी ओर श्री युगल की रासलीला के प्रति अनन्य निष्ठा व्यक्त करते हुए, उसे भी प्राणस्वरूप ही माना गया है। अपने पूर्व रसिकों द्वारा किये गये श्रीराधा माधव के रासलीला-विहार-दर्शन की कामना श्री प्रियादास जी में भी निरंतर रहती थी और ये भी शरद् चन्द्रिका में यमुना तट पर होने वाली रासलीला को नित्य ही देखते रहना चाहते थे।
श्री प्रियादास जी ने अपने काव्य में वृन्दावनान्तर्गत कई स्थलों को रासलीला विहार-स्थली के रूप में चित्रित किया है। इन सभी स्थलों में विविध लीलाओं के केन्द्रस्वरूप-संकेत वट का रासमण्डल, ललिता कुण्ड, कोकिला वन, जावट वट, राधा कुण्ड, कंदर्पसर, चन्द्रसर, गोविन्द कुण्ड, शोभा कुण्ड, गह्वर वन तथा वंशीवट आदि सुप्रसिद्ध हैं। श्री प्रियादास जी की धारणा है कि इन स्थलों के रासमण्डलों में, इच्छानुसार श्रीयुगल की रासलीला होती रहती है। 
श्री प्रियादास जी का अधिकतर निवास वृन्दावन में ही रहा था। रसिकों का उन्होंने संग किया था। उन्होंने रसिकता का मूल-सिन्धु सम्प्रदाय के अनुसार श्री रूप-सनातन को माना है। उपासना करने के लिए उनकी दृष्टि में वृन्दावन-निवास आवश्यक है, यदि तन से कोई वृन्दावन में न भी रह सके तो मन से उसके प्रति दृढ़ स्नेह निरन्तर बनाये रखे।

भूतल में वृंदा विपिन ए सर्वोपरि आहि ।
बड़ी भूल नहिं बस सकै, फिर कव पावै ताहि ।।
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (7)
 
इस भूतल में स्थित श्री धाम वृंदावन ही सर्वोपरि विश्राम स्थल है । यदि इस धाम में वास न हो सके तो बहुत बड़ी भूल होगी, फिर ऐसा अवसर न जाने कब प्राप्त होगा?
 
श्री वृन्दावन धाम में, बसै निरन्तर देह ।
जौ दुर्दैव न बसि सकै, मन दृढ़ करै सनेह ।।
- श्री प्रियादास जी, अनन्य मोदिनी (9)
 
ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि नित्य ही यह देह वृंदावन धाम में बसे, परंतु यदि किसी दुर्भाग्य वश ऐसा सम्भव न हो तो जहां हो वहीं से दृढ़ता [अनन्य भाव से] पूर्वक मन में वृंदावन के प्रति स्नेह बढ़ाओ ।

वृन्दावन में निवास करने से श्यामाश्याम के प्रति सहज ही प्रीति हो जाती है। युगल किशोर उसका चित्त सहज ही चुरा लेते हैं। वे कहते हैं, “जिसका चित्त श्री युगल किशोर ने चुरा लिया है, उस प्रेम-रस पीने वाले को और किसी की आशा नहीं रहती। वह रात-दिन रूप-माधुरी का पान करता रहता है। उसका हृदय दर्पण के समान स्वच्छ और कामनाओं से विरहित हो जाता है। आँखों में भरी प्रेम की बातों को सुनकर, जिसकी बुद्धि उसी प्रेम में विलीन हो गई है, वह प्रेमी श्वासहीन सा घूमता है। बड़े भाग्य से ही ऐसे रसिक मिलते हैं, जो नेत्रों को ऐसी उपासना के दर्शन करा देते हैं।”
प्रियादास सेवा का क्रम बताते हुए कहते हैं कि “उपासक रात-दिन प्रकट सेवा में लीन रहे। वह अपने सिद्ध (सखी) रूप से नित्य युगल की भावपूर्ण सेवा करता रहे। रसिक सहचरीगण का आनुगत्य करे। सहचरीगण निरन्तर उस रूप माधुरी का पान करती रहती हैं, क्षण भर भी युगल का सामीप्य नहीं तजतीं। इसी भाव से उपासक भी स्मरण करता रहे, नेत्रों में उत्कंठा बनी रहे, तभी वे लाडिले कृपा करते हैं। इसी भाव में सिद्धि है, परन्तु भाव को अन्तस्तल में छिपाये रखे, जग में उपहास न होने दे।”
 
श्री हरि के भक्तमाल कथा के प्रथम श्रोता होने का एक प्रसंग :
श्री प्रियादास जी ने जब भक्तमाल की टिका को सम्पूर्ण किया तो उन्हें ब्रज धाम की परिक्रमा करने की इच्छा हुई। श्री प्रियादास जी संतों के संग ब्रज परिक्रमा के लिए चल पड़े। ब्रज की लता-पता एवं कुण्ड सरोवरों के दर्शन कर आनंद में डूबे हुए परिक्रमा करते-करते श्री प्रियादास जी कोसी से कुछ आगे होड़ल पहुँचे। होडल में श्री निम्बार्क संप्रदाय का एक मंदिर था जिसके महन्त श्री लालदास जी थे। मंदिर के ठाकुर श्री लालबिहारी बिहारिणी जू विराज रहे थे। ठाकुर के दर्शन कर श्री प्रियादास जी बड़े आनंदित हुए। महन्त श्री लालदास जी रसिक भक्त थे और बड़े संतसेवी थे। उन्होंने श्री प्रियादास जी के संग समस्त संतों को रोक लिया और श्री प्रियादास जी से भक्तमाल कथा करने का अनुरोध किया। श्री लालदास जी के संत सेवा से प्रसन्न हो श्री प्रियादास जी वहीँ रूक गए और श्री भक्तमाल की कथा आरम्भ की। समस्त संत एवं भक्तगण कथा सुनने लगे। 
एक दिन रात्रि में वहां कुछ चोर आए। चोरों ने मंदिर के ठाकुर, उनके आभूषण एवं मंदिर में विराजमान सेवा की समस्त सामग्री चुराकर ले गए। सुबह जब मंदिर का पट खुला तो पुजारी ने देखा की न तो ठाकुर जी हैं और न ही सेवा की कोई सामग्री। पुजारी समझ गए की यह चोरों का काम है। मंदिर में सब संतों को जब यह पता चला की चोर ठाकुर जी को ले गए तो सब बड़े दुखी हो गए। श्री प्रियादास जी भी बड़े दुखी हुए और उस दिन कोई रसोई नहीं की एवं भूखे रहे, कथा भी नहीं की। श्री प्रियादास जी ने कहा "ठाकुर जी को भक्तमाल की कथा प्रिय नहीं है, इसलिए चोरों के संग पधार गए।"
महन्त श्री लालदास जी ने श्री प्रियादास जी से हाथ जोड़कर प्रार्थना की "हे श्री प्रियादास जी, मेरा त्याग कर ठाकुर जी चोरों के संग चले गए, अब आप भी मुझे त्याग कर चले जायेंगे तो मेरी कुगति होगी। श्री हरि की यही इच्छा समझकर भक्तमाल की कथा आरम्भ कीजिये और रसोई कीजिये।"
श्री प्रियादास जी बोले "अब मैं कभी भक्तमाल की कथा नहीं कहूंगा, भक्तमाल के रचयता श्री नाभादास जी ने कहा है की 'श्री हरि को भक्त चरित्र बहुत प्रिय है', जो आज असत्य सिद्ध हुई है, इसीलिए श्री ठाकुर जी कथा को छोड़कर भाग गए।" ऐसा कहकर श्री प्रियादास जी भूखे रहे, और सब संत चिंतित हो गए। 
यहाँ चोरों को निद्रा आ गई और श्री ठाकुर जी ने प्रत्येक चोर को स्वप्न में कहा "जहाँ से मुझे लाए हो पुनः वहीँ पहुँचा दो नहीं तो तुम सबको बहुत दुःख भोगना पड़ेगा। एक दुःख तो यह है की मेरे भक्त दुखी हैं, दूसरे मैं भक्तमाल की कथा नहीं सुन पाया। तुम सबके कारण मुझे दोहरा दुःख सहना पड़ रहा है, मैं तुम सबको चौगुना दुःख दूँगा।"
श्री ठाकुर जी के इस चेतावनी को सुनकर सब चोर मध्यरात्रि में ही उठ गए और बड़े हर्षित होकर श्री ठाकुर जी को संग लेकर मंदिर की ओर चल पड़े। सब चोर नृत्य और कीर्तन करते हुए मंदिर की ओर बढ़ने लगे। सुबह होने से पहले ही मंदिर में यह सूचना पहुँच गयी की चोर ठाकुर जी को संग ले कीर्तन करते हुए मंदिर आ रहे हैं। समस्त संतगण हर्षित हो गए और कीर्तन करते हुए चोरों के सम्मुख आये। संतगण प्रेम में छके हुए अपनी सुधि-बूधी भूले हुए थे, श्री ठाकुर जी के चरणों का स्पर्श कर अपने ह्रदय को शीतल कर रहे  थे। चोरों के ह्रदय भी शुद्ध हो चुके थे, वे कुछ कह नहीं पा रहे थे, श्री ठाकुर जी के वचनों का स्मरण कर उनकी छाती तो फटी जा रही थी और आँखों से आंसू बहे जा रहे थे। किसी प्रकार अपने को संभाल कर चोरों ने अपने आंसू पोंछे और सपने की सब बात संतो को बतायी। संतगण श्री ठाकुर जी के स्वप्न की बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए, उनके सब दुःख दूर हो गए। मंदिर में श्री ठाकुर जी को पधराया गया और बड़े हर्ष से उत्सव किया गया। पुनः भक्तमाल की कथा आरम्भ हो गयी। सब संतगण कहने लगे की भक्तमाल कथा के प्रथम श्रोता तो श्री हरि ही हैं। 
 
ग्रन्थ रचना :
श्री प्रियादास जी के पाँच ग्रन्थ सुविख्यात हैं, यथा -
1. अनन्य मेदिनी, 2. चाहबेली, 3. भक्त सुमिरिणी, 4. रसिक मोहिनी तथा 5. भक्त माल की भक्ति रसबोधिनी टीका।
 
प्रियादास जी के ग्रन्थ 'रसिकमोहिनी' में कुल 111 दोहे हैं, जिनमें वृन्दावन धाम की महिमा का वर्णन किया गया है। 'अनन्य मोदिनी' में व्यास जी के उद्धरणों को छोड़कर कवित्त और दोहों की कुल संख्या 75 है, इनमें भक्ति का अनन्य सिद्धान्त वर्णित है। 'चाहबेली' में कुल 51 छन्द हैं, जिनमें कृपा की चाह प्रकट की गई है। 'भक्त सुमरनी' 35 छंदों की छोटी सी रचना है, जो भक्तमाल में आये भक्तों की सूचीमात्र है। इनकी रचना 'रसिकमोहिनी' में भी रचनाकाल दिया हुआ है, जो 1683 है।
श्री प्रियादास जी के वाणी साहित्य में रासलीला के जो वर्णन देखने में आये हैं, वे सांकेतिक होने के साथ-साथ संक्षिप्त भी हैं। रासलीलान्तर्गत वन-विहार का निरूपण अत्यन्त सरस तथा उत्कृष्ट है। यमुना जल के मध्य, गोपियों के मण्डल में अवस्थित श्रीयुगल जल-क्रीड़ा में रत दृष्टिगोचर हो जाते हैं। श्री प्रियादास जी ने जल-विहार के उपरान्त वन-विहार का जो दृश्य अंकित किया है वह भी अलौकिक माधुरी से परिपूर्ण, सखियों से आवेष्टित तथा श्रीयुगल की कृपा से ही दर्शनीय होता है। चाहबेली नामक ग्रंथ में भी श्री प्रियादास जी ने अरिल्ल (छन्द) के अन्तर्गत वंशीवट पर मुरली वादन, रासलीला रमणोत्सव एवं जल-विहार का सांकेतिक वर्णन प्रस्तुत किया है। ऐसा प्रतीत होता कि श्री प्रियादास जी जहाँ एक ओर श्रीकृष्ण रस के रसिक थे, वहीं दूसरी ओर रसिक मर्यादा के परिपोषक भी थे। यही कारण है कि उन्होंने अत्यन्त सुमर्यादित रूप में अपनी रासलीला विषयक भावना को प्रकट किया है।