जन्म एवं बाल्यकाल :
श्री रूपरसिक देवाचार्य जी का जन्म दक्षिण देश में हुआ था और ये जाति के ब्राह्मण थे। श्री परशुराम देवाचार्य जी के समकालिक होने के कारण श्री रूपरसिक देवाचार्य जी का जन्म 1500 के लगभग अनुमानित होता है। इनकी बाल्यकालीन शिक्षा उपदेशादिक भी इसी देश में हुई थी। इसलिये इनकी मातृ भाषा भी इसी देशवासियों की सी थी। संस्कृत के भी अच्छे विद्वान थे। बाल्यावस्था से ही नैष्ठिक ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक श्रीराधाकृष्ण के सेवार्चन में सदा रत रहा करते थे।
संत सेवा के प्रति निष्ठा :
परिवार-पोषण के लिये श्री रूपरसिक देवाचार्य जी खेती करते थे। सन्तसेवा में इनकी बडी निष्ठा थी। बहुत कालतक इनके यहाँ सन्तसेवा सुचारु रूप से चलती रही। एक साल वर्षा के अभाव में (वर्षा कम होने के कारण) खेती में अन्न की उपज कुछ भी नही हुई। ऐसी स्थिति में घर मे उपवास की स्थिति आ गयी। बाल-बच्चे भूखे मरने लगे। श्री रूपा जी अन्न की तलाश में कहीं जा रहे थे। मार्ग में सन्त जन मिल गये तो उन्हें अनुनय-विनयकर घर लिवा लाये। ये तो संतों के आने से बड़े प्रसन्न हो रहे थे, परंतु इनकी पत्नी घबड़ायी कि इतने संतों का सत्कार कैसे होगा ? घर में तो कुछ अन्न धन ही नही है।
इन्होंने पत्नी से कहा कि - यदि कोई आभूषण हो तो दो, उसे बेचकर संतो की सेवा में लगा दूँ। इन संतो के आशीर्वाद से ही दुखों की निवृत्ति होगी। पत्नी के पास केवल एक नथ थी। उसने सोच रखा था कि कुछ दिन में यदि धन की व्यवस्था नही हो पायी तो यह नथ बेच कर अन्न खरीद लेंगे। परंतु वह नथ अब उसने लाकर पति को दे दी। श्री रूपाजी ने उसे ही बेचकर संतों की सेवा की। संतों के पीछे सबने सीथ-प्रसादी (संतो से विनती कर के मांगा हुआ उनका जूठा अथवा बचा हुआ प्रसाद) पायी। उसी रात को भगवान ने स्वप्न में कहा कि घरमें अमुक जगह अपार सम्पत्ति गडी पडी है, उसे खोदकर आनन्द पूर्वक सन्त सेवा करो। श्रीरूपाजी ने वह स्थान खोदा तो सचमुच इन्हें बहुत सारा धन प्राप्त हुआ। फिर तो बड़े आनन्द से दिन बीतने लगे।
श्री रूपरसिक देवाचार्य जी का संतों के प्रति प्रेम उनके एक पद से मिलता है:
अच्युतगोती मेरे इष्ट।
जिन सेवा ते सकल कामना पुरवत मन आनंद प्रविष्ट॥
श्री हरि के भक्त मेरे इष्ट हैं, जिनकी सेवा से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है और मन आनंद को प्राप्त करता है।
गुरु प्राप्ति की इच्छा:
श्री रूपरसिक देवाचार्य जी को माधुर्य्य रस के गम्भीर भावनादिकों संग ही नवधाभक्ति के श्रवणादिक में अत्यन्त अभिरुचि थी। श्रीकृष्णोपासक वैष्णवागमन श्रवण मात्र से ही इनका हृदयकंज खिल उठता था। अत्यन्त हर्ष-पूर्वक दर्शनोत्कण्ठित हो शीघ्रता से नंगे पाँव दौड़ते हुये परम स्नेह से, धेनुवच्छवत् जा मिलते थे। सजल नेत्रों को भक्त बदनाम्बुज दर्शन करा तृप्त करते थे और उनके मुख कमल द्वारा भक्त एवं हरि चरित्र श्रवण कर अति प्रसन्न होते थे।
36 वर्ष पर्य्यन्त इसी प्रकार भक्ति, भावना, साधु सेवादिकों में व्यतीतोपरान्त श्री रूपरसिक देवाचार्य जी को सद्गुरु प्राप्ति की सत्य अभिलाषा हुई। भगवान् अपना परम प्रियभक्त जान, पूर्व जन्म संस्कार-सकृत, इनकी उच्चाति-उच्च उपासना देख आज्ञा की कि, "तुम श्रेष्ठ-क्षेत्र मधुपुरी ( मथुरा ) धाम में जाकर, श्रीहरिव्यास देवाचार्य से शिष्यत्व ग्रहण कर, उनकी आज्ञानुसार भजन भावना में जीवन व्यतीत करो। केवल उनसे ही तुम्हारी अभीष्ट-सिद्धि होगी।"
श्री हरिव्यास देवाचार्य की महिमा:
श्री हरिव्यास देवाचार्य की महिमा:
श्री रूपरसिक देवाचार्य जी ने श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी के अलौकिक प्रभाव एवं सद्गुणों को हृदय कंजपर प्रथम से ही भ्रमर बना रखा था। अनेक सन्त वहां जाते थे, और श्रीहरिव्यासदेवजी के अद्भुत प्रभाव वर्णन किया करते थे। श्रीहरिव्यास देवाचार्य के तत्कालीन भक्तों में सर्वश्रेष्ठता का परिचय, तथा उनमें भक्ति भावना का अत्यन्त प्रावल्यता सुन उनके दर्शन के लिये इनके हृदय में अत्यन्त उत्कट इच्छा हुआ करती थी। श्री रूपरसिक देवाचार्य जी दर्शनाभिलाषी एवं व्याकुल होकर प्रार्थना करते हुये कह उठते थे कि "हे प्रभो ! हे आचार्य्यवर !! मुझे आपके चरणाम्बुज दर्शन का सौभाग्य कब प्राप्त होगा; जिससे मैं इस मानव-देह को कृतकृत्य समझूँगा ।"
श्रीहरि आज्ञा पाकर श्री रूपरसिक देवाचार्य जी अति प्रसन्न हुये, उसी समय कठिन-सांसारिक श्रृंखला को तोड़, दिव्य-जीवन के स्वछन्द मन-वाटिका में भ्रमण करते हुये, हृदय में दर्शनाभिलाषा के उत्कट धारणा को धारण किये, ध्यान के संलग्नता में मथुराधाम को प्रस्थान हो गये। अदर्शनयुक्त एक-एक क्षण एक-एक कल्प के समान प्रतीत होने लगा। मार्ग में उनका ही गुणानुवाद करने लगे
“हरिव्यासदेवाय नमः पारक- मन्त्र जु एह।
मनु नायक तारक यहै दायक जुगल सनेह॥
हरिव्यासदेवाय नमः शरणमन्त्र यहज्ञान ।
या विन राधारमण सो होय न दृढ़ पहिचान॥”
मथुरा आगमन:
ऐसे अनेकप्रकार श्रीहरिव्यास-नाम--संकीर्त्तन करते हुये मथुरा में श्रीहरिव्यास- आश्रम में पहुँचे; किन्तु वहां तो आल्हाद के स्थान पर विषाद का साम्राज्य था। सभी वैष्णव तेजहत हो रहे थे, मानो सहस्रों प्रभाकर रश्मि-रहित हो, मलिनता को ग्रहण कर लिये हों, वहां की प्रकृति सौंदर्य दिव्याभूषण को खोकर भयंकर रूप धारण कर रही थी। तरुलता मुरझाकर मूर्छित से प्रतीत होते थे। समस्त अपने प्रभावशाली प्रियभाजन के बिछोह में दुखी थे। मानो अनाथ बच्चा पिता के आजन्म अज्ञात से दुखी हो। श्रीहरिव्यासदेवजी स्वानन्द में ही सहस्रों को तड़फते छोड़कर निज नित्य विहारस्थ परिकर में स्वरूप से जा मिले थे। वहां अनेक दिनों के विछुरे प्रधान्या सेवा-सहयोगिनी को पाकर नित्य नये आनन्द मनाये जा रहे थे। आश्रम के समस्त वैष्णवों के मनोद्गार में श्रीरूपरसिकजी को भी सम्मिलित होना पड़ा। इन्होंने सब को दुखी देखकर इसका कारण पूछा तो ज्ञात हुआ कि श्रीआचार्य्य वर इस अनित्य-अवनि पर नहीं हैं। सब को अनाथ त्याग, नित्य घाम को प्रस्थान कर गये। यह सुनते ही श्री रूपरसिक देवाचार्य जी के हृदय में मानो वज्राघात हुई, मूर्छित होकर पृथ्वी के गोद में लेट गये। वहां सन्त एवं दर्शकजनों में घबराइट फैल गई, कि ब्राह्मण को क्या हुआ ! वे अनेक प्रकार चेष्टा कर मूर्छावस्था से जागृत किये। श्री रूपरसिक देवाचार्य जी ने सब के सन्मुख अपने आने का उद्देश्य कहा और प्रतिज्ञा की कि- “जब तक श्री आचार्य वर क दर्शन न कर लूंगा तब तक अन्य कार्य नहीं करूंगा।" इसप्रकार कह कर एकासन से ध्यानावस्थित हो, दृढ़ता पूर्वक बैठ गये। सात दिनरात्रि व्यतीत हो गये अनसनब्रतारूढ़ से विचलित नहीं हुये।
श्री हरिव्यास देवाचार्य के दिव्य रूप का प्रकट होना:
ऐसे अनेकप्रकार श्रीहरिव्यास-नाम--संकीर्त्तन करते हुये मथुरा में श्रीहरिव्यास- आश्रम में पहुँचे; किन्तु वहां तो आल्हाद के स्थान पर विषाद का साम्राज्य था। सभी वैष्णव तेजहत हो रहे थे, मानो सहस्रों प्रभाकर रश्मि-रहित हो, मलिनता को ग्रहण कर लिये हों, वहां की प्रकृति सौंदर्य दिव्याभूषण को खोकर भयंकर रूप धारण कर रही थी। तरुलता मुरझाकर मूर्छित से प्रतीत होते थे। समस्त अपने प्रभावशाली प्रियभाजन के बिछोह में दुखी थे। मानो अनाथ बच्चा पिता के आजन्म अज्ञात से दुखी हो। श्रीहरिव्यासदेवजी स्वानन्द में ही सहस्रों को तड़फते छोड़कर निज नित्य विहारस्थ परिकर में स्वरूप से जा मिले थे। वहां अनेक दिनों के विछुरे प्रधान्या सेवा-सहयोगिनी को पाकर नित्य नये आनन्द मनाये जा रहे थे। आश्रम के समस्त वैष्णवों के मनोद्गार में श्रीरूपरसिकजी को भी सम्मिलित होना पड़ा। इन्होंने सब को दुखी देखकर इसका कारण पूछा तो ज्ञात हुआ कि श्रीआचार्य्य वर इस अनित्य-अवनि पर नहीं हैं। सब को अनाथ त्याग, नित्य घाम को प्रस्थान कर गये। यह सुनते ही श्री रूपरसिक देवाचार्य जी के हृदय में मानो वज्राघात हुई, मूर्छित होकर पृथ्वी के गोद में लेट गये। वहां सन्त एवं दर्शकजनों में घबराइट फैल गई, कि ब्राह्मण को क्या हुआ ! वे अनेक प्रकार चेष्टा कर मूर्छावस्था से जागृत किये। श्री रूपरसिक देवाचार्य जी ने सब के सन्मुख अपने आने का उद्देश्य कहा और प्रतिज्ञा की कि- “जब तक श्री आचार्य वर क दर्शन न कर लूंगा तब तक अन्य कार्य नहीं करूंगा।" इसप्रकार कह कर एकासन से ध्यानावस्थित हो, दृढ़ता पूर्वक बैठ गये। सात दिनरात्रि व्यतीत हो गये अनसनब्रतारूढ़ से विचलित नहीं हुये।
श्री हरिव्यास देवाचार्य के दिव्य रूप का प्रकट होना:
स्वयं श्रीहरि को श्रीहरिव्यासदेव रूप अथवा श्रीहरिव्यासदेवाचार्य्य को ही स्वयं प्रगट होना पड़ा। यहाँ संशय की आवश्यकता नहीं ! लौकिक में भक्तियोग के संग ही अष्टांग योगादि सिद्धिपूर्ण योगियों के लिये यह कार्य स्वाभाविक ही है। उनमें गुप्त प्रगटादिशक्ति का होना अनिवार्य ही है, क्योंकि तत्व में प्रवेश, [अन्तर्ध्यान, वपुपरिवर्तन अनेक शक्ति उनके आश्रय रहती है; तथापि ये तो सर्वशक्तिमान श्रीहरिप्रिया स्वरूप ही थे, इनकी शक्ति-समालोचना कर सूर्य को दीपक दिखाना है। आज अपने एक भक्त के हृदयागार में, प्रगाढ़-प्रेम-तत्व के दृढ़ता में परीक्षोतीर्ण का परिचय पाते ही और विलम्ब में असमर्थ हो, प्रगट होकर सुमधुरवाणी से कहने लगे—“हे प्रिय वत्स ! नेत्र खोलो" उस दिव्य प्रेमयुक्त वाणी को श्रवण कर, नेत्र खोलते ही, श्रीआचार्य्य वर का दर्शन कर, श्री रूपरसिक देवाचार्य जी का हृदय गद्गद् हो गया, आनन्द की सीमा न रही। श्रीरूपरसिक जी तत्क्षणही श्रीचरणाम्बुजों में लेट, नेत्राश्रु द्वारा अवनि सींचन करते हुये, गद्गद्स्वर से अनेक प्रकार स्तुति के उपरान्त, उनके कृपा पर मुग्ध हो गये। श्रीआचार्य्य वर ने स्वाभिप्राय प्रगट करने की आज्ञा दी। इन्होंने प्रार्थनायुक्त-वाक्य से प्रार्थना की कि “हे प्रभो ! हे शरणागत रक्षक ! हे गुरुदेव ! आप सर्वान्तर्यामी हैं; तथापि आप अपने चरणाश्रय-भक्तों के विनम्र सुमधुर - वाक्यों को श्रवण करने में अति चाव रखते हैं। माता-पिता वात्सल्यतावश अपने शिशु को अनेक बातों में उलझा, उसके विभोर-युक्त कोमल वाक्यों को श्रवण कर, अति प्रफुल्लित होते हैं। मैं भी संकोच परित्याग कर प्रार्थना करता हूँ कि - शरणागत कर, इस अपार भवोदधि में फँसा हुआ, मुझ पतित को उद्धार करने की कृपा करिये।” भक्त के कातर- हृदय से निकली हुई सविनयवाणी ने दिव्यवपु आचार्य्य वर को इस वरदान के लिये विवश कर दिया। उसी क्षण हृदय से लगा कर, स्वभक्तवत्सल्यता के पराकाष्ठा का परिचय दीया। विधिपूर्वक श्रीगोपालमन्त्रराजोपदेश एवं 'श्रीमहावाणी' प्रदान कर, स्वसच्चे भक्तों के लिये अदूरदर्शिता और नामधारियों के लिये दूरदर्शिता का परिचय दे, निज दिव्याचार्य वपु को अन्तर्ध्यान कर, निज स्वरूप से नित्यविहार में प्रवेश कर गये।
जिसप्रकार श्रीमद्भागवत् को श्रीव्यासजी ने निर्मित कर, उसे विश्व में प्रचार, श्रीशुकदेवजी के द्वारा कराया, उसी प्रकार श्रीमहावाणी को श्रीहरिव्यादेवजी ने श्रीरूपरसिकदेवजी के द्वारा प्रगट करने की आज्ञा की। इन्होंने ही श्रीमहावाणी को रसिकों में प्रचार किया एवं श्रीगुरुके आदेशानुसार आजीवन श्री महावाणी जी के मनन चिन्तन में रत रहते हुए श्री श्यामा श्याम की आराधना करते रहे ।
वृन्दावन की अनन्य निष्ठा :
श्री रूपरसिक देवाचार्य जी कहते हैं की वृन्दावन की समानता किसी से भी नहीं किया जा सकता, उदाहरण के लिए -
श्री वृंदावन धाम जहां श्री श्यामा स्याम नित्य विहार पारायण हैं, उस नित्य धाम की उपमा किसी से भी करना असम्भव है, जिसकी एक कण मात्र की सुंदरता से ही सर्वोपरि गोलोक धाम हेय प्रतीत होता है ।
उपमा वृंदाविपिन की, देवे को नहिं ओक।
जाकी सुखमा लेश तें, सर्वोपरि गोलोक॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (27)
चारों वेदों, छह शास्त्रों, एवं अठारह पुराणों के सार का भी सार वृंदावन का ध्यान है।
चारि वेद षदशास्त्र, अष्टादश जु पुरान।
सकल सार कौ सार है, वृंदावन को ध्यान॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (80)
जिसे वृंदावन का यश सुनने में रुचि न हो उसका संग तुरंत त्याग देना चाहिए क्यूँकि उसका संग करना ही सबसे बड़ा पाप है।
वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ।
ताकौं तजिये तुरत हीं, वा सम दूरित न कोइ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (31)
यदि किसी कारण वश वृंदावन वास सम्भव न हो, तो अपने मन में वृंदावन को बसा लीजिए। विश्वास करिए यह सत्य है, रसिक संतों ने वृंदावन के स्मरण को भी पर्याप्त माना है।
जो कदाचितन ना बसै, तौ निज मनहिं बसाय।
यामें नाहिन झूठ कछु, कहत महत कविराय॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (46)
भावनात्मक रचनाएँ :
लीला वंशति में अनेक पद, पंक्तियाँ एवं दोहे भावपूर्ण हैं जिनके भाव अन्य रसिकों की भांति बहुत उच्च कोटि के हैं।
यद्यपि श्याम सुंदर परम प्रवीण हैं एवं समस्त लोक चूड़ामणि हैं परंतु वह भी श्री राधिका प्यारी के प्रेम के आधीन होकर नित्य दीन रहते हैं । निम्नलिखित दोहे में इसका सुंदर चित्रण किया है:
सकल लोक चूड़ामणि, यदपी लाल प्रवीण ।
तदपि प्यारी प्रेम के आगे ह्वै रहें दीन ।।
सकल लोक चूड़ामणि, यदपी लाल प्रवीण ।
तदपि प्यारी प्रेम के आगे ह्वै रहें दीन ।।
- प्रेम मंजरी (2)
श्री धाम वृंदावन में मधुर उपासना का ही राज है, जिसके समान और कहीं कोई सुख नहीं । अनंत कोटि ऐश्वर्यता को यहाँ के एक बूँद के माधुर्य पर नयौछावर किया जाता है । जैसे निम्नलिखित दोहे में वर्णित है:
यहाँ राज माधुर्य को, जिहिं सम सुख नहिं कोई ।
कोटि कोटि ऐश्वर्यता, एक बूँद तैं होई ।।
कोटि कोटि ऐश्वर्यता, एक बूँद तैं होई ।।
- माधुर्य माधुरी (13)
निम्नलिखित दोहे के अनुसार श्री नित्य विहारिनी श्री श्यामा जू को अपना जीवन प्रान एवं गति माना है:
तुम्हीं जीवनी प्रान मम, तुम्हीं जान सुजान ।
अहो बिहारिनी लाडिली, मेरें गति नहिं जान ।।
- नित्य विलास (4)
अहो बिहारिनी लाडिली, मेरें गति नहिं जान ।।
- नित्य विलास (4)
“प्यारी ज़ू तुम्हीं हौं गति मेरी"
- नित्य विहार पदावली (70)
- नित्य विहार पदावली (70)
एक पद में उन्होंने अपने अंतरंग भाव को व्यक्त किया है:
हो घनस्याम भरौ जिन मो तन चोवा छिरकन भोरे ही।
अपने रंग मिलायेई चाहत सहत नहीं काहू गोरे हीं॥
जानतिहों पछितावत हौ मन लखि मों अंगनि औरेहीं।
'रूपरसिक' विधना के सारे श्रवन होत बरजोरे हीं॥
हे घनश्याम, भोर ही में मेरे अंगों पर इत्र न छिड़किये। मुझे भी आप अपने जैसा सांवला ही बना देना चाहते हो ? किसी का गोरा रंग आपसे सहन नहीं होता ! मैं जानती हूँ की आप मेरे अंगों को अपने अंगों से पृथक वर्ण का होने से मन-ही-मन पछता रहे हो। श्री रूपरसिक देवाचार्य जी कहते हैं "विधाता के सब कार्य बिना इच्छा के भी पूर्ण होते हैं, इसपर हमारा कोई बस नहीं।"
ग्रन्थ रचना :
अभी तक श्री रूपरसिक देवाचार्य जी द्वारा निर्मित चार काव्य उपलब्ध हो पाए हैं।
1 : वृहदोत्सव मणिमाल
2 : हरिव्यासयशामृत
3 : नित्यविहार पदावली
4 : लीला विंशति
श्रीहरिव्यासयशामृत में श्रीहरिव्यासदेवजी का स्वरूप-तत्त्व वर्णन है। श्रीवृहदोत्सवमणिमाल अमुद्रित है। वसन्त से लेकर व्यञ्जनद्वादशी तक दश अवतार के मंगल बधाई और अन्य उत्सव के पद हैं। इस ग्रन्थ की 1994 श्लोक संख्या है। नित्यविहार पदावली में 120 नित्यविहार सम्बन्धी पद वर्णित है। लीला विंशति में 20 लीलाओं का वर्णन है जिसमें वृंदावन माधुरी, नाम माधुरी, रस मंजरी, माधुर्य माधुरी, नित्य विलास आदि 19 लीलायें पद्य में हैं और एक "सिद्धान्त माधुरी" गद्य में है।

