(राग झंझौटी)
प्यारी जू तुम्हीं हौ गति मेरी ।
चूक छिमा करिए दुःख हरिये जू हौं,
तेरी जनम जनम की चेरी ।। [1]
भ्रमिय बहुत वन वन वलि जाऊँ ए जू,
लहिय न तनक हौं सुख की सेरी ।। [2]
दीन हीन पर दया द्रवन की,
जू तुम विन कहौ सरनि किहिं केरी ।। [3]
इहिं अवसर अव परहरिहौ तौ,
जू कहाँ सरनि मौहि मिली है जू तेरी ।। [4]
भवसागर मैं वहीय फिरत हौं,
जू महामोह दुरमति की घेरी ।। [5]
अनुचरी परि अनुकम्पा कीजे ए,
जू दीजे अब मोकों दरस दरेरी ।। [6]
रूपरसिक जन जांनी आपनी,
जू राखियैं चरन कमल सों नेरी ।। [7]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (70)
हे प्यारी जु तुम ही मेरी गति हो । मैं तो तेरी जनम जनम की दासी हूँ, यदि मेरे द्वारा कोई अपराध [चूक] हो गए हों तो उसे क्षमा कर मेरे दुःख का हरण करिए । [1]
मैं ब्रज धाम के वनों में भ्रमण करती रही, आपके लीला स्थलियों पर स्वयं को न्यौछावर करती रही, लेकिन आपके अतिरिक्त एक क्षण भी कहीं सुख से विश्राम नहीं किया। [2]
हे प्यारी जू, तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन है जो मुझ जैसी दीन हीन पर दया की दृष्टि डाले, तुम ही बताओ तुम्हारे अतिरिक्त मैं किसकी शरण ग्रहण करूँ ? [3]
अब इस अवसर पर यदि हे प्यारी जू, आप मेरा त्याग कर देंगी तो पुनः मुझे कहाँ आपके चरणों की शरण प्राप्त होगी। [4]
अन्यथा मैं तो महामोह दुर्मति युक्त अनंत काल से भव सागर में ही डूब रही हूँ । [5]
हे प्यारी जू, अपने आश्रित जन पर कृपा कर अब मुझे अपने दर्शन एकांत में देकर मेरी अभिलाषा को पूर्ण कीजिए । [6]
श्री रूप रसिक देवाचार्य जी कहते हैं कि हे श्यामा जू, अब मुझे अपना जानकर नित्य ही अपने चरण कमलों के समीप रखिए । [7]
प्यारी जू तुम्हीं हौ गति मेरी ।
चूक छिमा करिए दुःख हरिये जू हौं,
तेरी जनम जनम की चेरी ।। [1]
भ्रमिय बहुत वन वन वलि जाऊँ ए जू,
लहिय न तनक हौं सुख की सेरी ।। [2]
दीन हीन पर दया द्रवन की,
जू तुम विन कहौ सरनि किहिं केरी ।। [3]
इहिं अवसर अव परहरिहौ तौ,
जू कहाँ सरनि मौहि मिली है जू तेरी ।। [4]
भवसागर मैं वहीय फिरत हौं,
जू महामोह दुरमति की घेरी ।। [5]
अनुचरी परि अनुकम्पा कीजे ए,
जू दीजे अब मोकों दरस दरेरी ।। [6]
रूपरसिक जन जांनी आपनी,
जू राखियैं चरन कमल सों नेरी ।। [7]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (70)
हे प्यारी जु तुम ही मेरी गति हो । मैं तो तेरी जनम जनम की दासी हूँ, यदि मेरे द्वारा कोई अपराध [चूक] हो गए हों तो उसे क्षमा कर मेरे दुःख का हरण करिए । [1]
मैं ब्रज धाम के वनों में भ्रमण करती रही, आपके लीला स्थलियों पर स्वयं को न्यौछावर करती रही, लेकिन आपके अतिरिक्त एक क्षण भी कहीं सुख से विश्राम नहीं किया। [2]
हे प्यारी जू, तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन है जो मुझ जैसी दीन हीन पर दया की दृष्टि डाले, तुम ही बताओ तुम्हारे अतिरिक्त मैं किसकी शरण ग्रहण करूँ ? [3]
अब इस अवसर पर यदि हे प्यारी जू, आप मेरा त्याग कर देंगी तो पुनः मुझे कहाँ आपके चरणों की शरण प्राप्त होगी। [4]
अन्यथा मैं तो महामोह दुर्मति युक्त अनंत काल से भव सागर में ही डूब रही हूँ । [5]
हे प्यारी जू, अपने आश्रित जन पर कृपा कर अब मुझे अपने दर्शन एकांत में देकर मेरी अभिलाषा को पूर्ण कीजिए । [6]
श्री रूप रसिक देवाचार्य जी कहते हैं कि हे श्यामा जू, अब मुझे अपना जानकर नित्य ही अपने चरण कमलों के समीप रखिए । [7]

