राधा मोहन-लाल को, जाहि न भावत नेह।
परियौ मुठी हज़ार दस, ताकी आँखिनि खेह॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (4)
जिनको राधा और कृष्ण का विशुद्ध प्रेम रुचिकर नहीं है, उनकी आँखों में दस हज़ार मुट्ठी धूल पड़ जाए। भाव यह है कि जो राधा-कृष्ण के प्रेम को साधारण समझते हैं, उन्हें लाख-लाख बार धिक्कार है।
परियौ मुठी हज़ार दस, ताकी आँखिनि खेह॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (4)
जिनको राधा और कृष्ण का विशुद्ध प्रेम रुचिकर नहीं है, उनकी आँखों में दस हज़ार मुट्ठी धूल पड़ जाए। भाव यह है कि जो राधा-कृष्ण के प्रेम को साधारण समझते हैं, उन्हें लाख-लाख बार धिक्कार है।

