जित देखौं तित स्याममई है - रसिक वाणी

जित देखौं तित स्याममई है - रसिक वाणी

जित देखौं तित स्याममई है।
स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घनघटा छई है॥ [1]
सब रंगन में स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है।
हौं बौरी, की लोगनहीकी स्याम पुतरिया बदल गई है॥ [2]
चन्द्रसार रबिसाद स्याम है, मृगमद स्याम काम बिजई है।
नीलकंठ को कंठ स्याम है, मनो स्यामता बेल बई है॥ [3]
श्रुति को अच्छर स्याम देखियत, दीपसिखापर स्यामतई है।
नर-देवन की कौन कथा है, अलख-ब्रह्मछबि स्याममई है॥ [4]

- रसिक वाणी

एक ब्रज की सखी जो हर जगह श्याम सुंदर को ही निहार रही है, वह कहती है: 

मैं जिस भी दिशा में देखती हूं, मुझे सब कुछ श्याम रँग ही दिखाई देता है। कुंज और वन श्याम रँग के हैं, यमुना का पानी भी श्याम रँग का है, एवं आकाश में श्याम रँग की ही घटा छाई हुई है। [1]


सब रंगों में श्याम रँग ही व्याप्त है ।लोग इसे काल्पनिक मान सकते हैं, क्या मैं बौरा गया हूँ? या लोगों की आँखों में श्याम रँग की पुतलियाँ भी बदल गई हैं? [2]

चाँद और सूरज श्याम रँग के लगते हैं; मृगमद एवं कामदेव भी श्याम रँग के हो गए हैं, नील कंठ का कंठ भी श्याम रँग का है, मानो पूरी पृथ्वी पर श्याम रंग व्याप्त हो गया है। [3]

वेदों के अक्षर भी सांवले प्रतीत होते हैं, दीपशिखा भी श्याम रँग की है। नर एवं देवताओं के बारे में क्या कहें, निराकार ब्रह्म ने भी मानो श्याम रँग ही धारण कर लिया। [4]