श्री ब्रजवासीदास जी की जीवनी 

श्री ब्रजवासीदास जी की जीवनी 

परिचय  : 
रसिक भक्त कवि श्री ब्रजवासीदास जी परम विरक्त एवं सांसारिक प्रचार-प्रपंच से सर्वदा दूर रहने वाले सिद्ध भक्त थे। निरन्तर श्रीराधा माधव का चिन्तन एवं उनका ही गुणानुवाद वर्णन इनका प्रमुख कार्य था। यह वल्लभ सम्प्रदाय के अनुगामी थे। इनका जन्म 1680 के आसपास अनुमानित होता है। 
 
आध्यात्मिक जीवन :
श्री ब्रजवासीदास जी का जीवन चरित्र अज्ञात है। उनके विषय में जो भी जानकारी प्रकाश में आयी है वह उन्हीं के रचनाओं से प्राप्त हुई है। इन्होने वल्लभ कुल में दीक्षा ग्रहण की थी। वल्लभ संप्रदाय शुद्धाद्वैतवाद पर आधारित है। श्री ब्रजवासी दास ने प्रस्तुत मतानुसार जीवात्मा और परमात्मा में अभिन्नता की स्वीकृति प्रदर्शित की है। परमात्मा की सृष्टि होने के कारण वे जगत को भी मिथ्या नहीं मानते। ब्रह्म का अध्यात्म स्वरूप 'अक्षर ब्रह्म' तथा भौतिक स्वरूप 'जगत' कहलाता है। ब्रह्म अनादि है, उसमें सत्, चित् और आनंद का नित्य आविर्भाव रहता है।
पुनि भगवान अनादि अज, ब्रह्म सच्चिदानन्द।
- ब्रज-विलास (कृष्णजन्मोत्सव वर्णन)
 
इनका रचनाकाल 1703 से 1763 स्वीकार किया गया है। श्री ब्रजवासीदास जी ने श्री कृष्ण की बाल लीला एवं किशोर लीला का वर्णन अपनी रचनाओं में किया है। 
 
श्री ब्रजवासीदास जी द्वारा श्री कृष्ण की बाल लीला का दर्शन :
श्री ब्रजवासीदास जी के अनुसार परं ब्रह्म के अतिरिक्त जगत के समस्त जड़ अथवा चेतन तत्त्वों में सत्, चित् और आनंद में से किसी एक अथवा दो तत्त्वों का तिरोभाव रहता है। इसी कारण वे परमात्मा से विलग स्वरूप धारण किये रहते हैं। अलक्ष्य, गुणातीत पूर्ण ब्रह्म ही साक्षात् श्रीकृष्ण का सगुण रूप धारण करके ब्रज में अवतरित होते हैं। उनका लक्ष्य गोप समाज (भक्त जन) को पुष्टि (आनंद तथा प्रेम) प्रदान करना है।
को पूरण को अलख गति, को गुण रहित अपार।
करत वृथा बकवाद कत यहि ब्रज नन्दकुमार॥
- ब्रज-विलास (उद्धव जी की आगमन लीला)
 
पर ब्रह्म परमेश्वर स्वेच्छा से जगत की रचना करते हैं। वसुदेव के घर में जन्म लेकर और नंद के यहां पल कर उन्होंने माता-पिता के रूप में उन्हें पूर्णानंद का आस्वादनावसर प्रदान किया तथा उनके समस्त ऐहिक एवं अलौकिक द्वंद्वों का उच्छेद कर दिया।
तात मात सुख दैन, सुन्दर रूप दिखाय के।
कियो परम उर चैन, दूर किये दुखद्वन्द सब॥
- ब्रज विलास (कृष्णजन्मोत्सव वर्णन)
 
वात्सल्य रति के आश्रय नंद, यशोदा, देवकी तथा वृद्ध गोप-गोपांगनाएं हैं। श्री ब्रजवासीदास ने मुक्त कंठ से देवकी और यशोदा के भाग्य की सराहना की है कि उन्हें ब्रह्म (कृष्ण) को अपनी गोद में खिलाने का अवसर प्राप्त हुआ।
इनसे और कौन बड़ भागी ब्रह्म धर्यो तनु जिन लागी।
- ब्रज विलास (देवकी और यशोदा का भाग्य)
 
सूर की भांति ही उनके वात्सल्य निरूपण में अत्यधिक स्वाभाविकता दर्शनीय है। बालक कृष्ण को माता यशोदा चंद्रमा के दर्शन करवा कर विचित्र संकट में पड़ गयी हैं। कृष्ण चंद्रमा का भोग करना चाहते हैं और यशोदा उन्हें समझाने का यत्न करती हैं कि चंद्रमा को पाना नितांत असंभव है। उनकी बाल बुद्धि के लिए समस्त तर्क अग्राह्य हैं :
कहति जसोदा कौन विधि समझाऊँ अब कान्ह।
भूलि दिखायो चंद मैं, ताहि कहत हरि खान॥
यहै देत नित माखन मोकों। छिन छिन देति तात सो तोकों॥
जो तुम स्याम चंद को खैहों। बहुरो फिर माखन कहूँ पैहों ?
देखत रहौ खिलौना चंदा। हठ नहिं कीजै बाल गोविन्दा॥
पा लागौ हठ अधिक न कीजै। मैं बलि, रिसहि रिसहि तन छीजै॥
जसुमति कहति कहा धौं कीजै। माँगत चंद कहाँ तें दीजै॥
तब जसुमति इक जलपुट लीनो। कर में ले तेहि ऊँचो कीनो॥
ऐसे कहि श्यामै बहराबै। आव चंद, तोहि लाल बुलावै॥
हाथ लिए तेहि खेलत रहिए। नैकु नहीं धरनी पै धरिए॥
 
श्री ब्रजवासीदास जी की वृन्दावन धाम के प्रति निष्ठा :
जिस वृन्दावन को श्रीकृष्ण ने अपनी रासलीला आदि विविध क्रीड़ाओं का केन्द्र बनाया था, वह वृन्दावन श्री ब्रजवासीदास जी की दृष्टि में भी चैतन्य स्वरूप होने के साथ-साथ श्रीकृष्ण का स्थूल रूप है। यहां गोपी जन इन्द्रियों के रूप में और स्वयं हरि चैतन्य रूप में विद्यमान है। सुख, रस एवं रूप की निधि-इसी वृन्दावन का स्तवन, निरन्तर समस्त श्रुतियाँ एवं देवगण करते रहते हैं। श्रीब्रजवासी दास ने शंखाकार ब्रज पर स्थित षोडश-दल-कमल के पाँच योजन विस्तृत आकार पर रासलीला-स्थली के केन्द्र स्वरूप वृन्दावन को स्वीकार किया है।
श्रीवृन्दावन छवि समुदाई, सम्यक वरणि कौन पे जाई।
जाकी पटतर को नहीं जाना, वन अनूप अद्वेत बखाना॥
- ब्रजविलास
 
श्री ब्रजवासीदास जी की धारणा है कि श्रीराधा-माधव इसी दिव्य वृन्दावन में नित्य नव-नव लीलाओं को करते रहते हैं। वे निर्गुण, निर्विकार एवं अविनाशी होते हुए भी, भक्तों के मनोरथ को पूर्ण करने हेतु अपने नित्य धाम वृन्दावन में उस रास-रस का विस्तार करते हैं, जिसे वेदों ने भी गाया है।
नित्य श्याम श्यामा सुखकारी, करत नित्य नव चरित बिहारी।
निर्गुण निर्विकार अविनासी, भक्त मनोरथ सदा विलासी॥
- ब्रजविलास
 
श्री ब्रजवासीदास जी के अनुसार रास-भूमि श्री वृन्दावन सामान्य भूमि न होकर 'सुखनिधि', 'रसनिधि' और 'रूपनिधि' के रूप में सारद, नारद, शेश, शिव और विधि द्वारा अभिनन्दनीय उदार वृन्दाविपिन की भूमि है -
सुखनिधि रसनिधि रूपनिधि वृन्दाविपिन उदार।
सारद नारद षेस शिव, बरनत विधि स्रति चारि॥
शोभा बृन्दाविपिन की, बरणी सकै अस कौन।
शेष महेश गणेश बिधि, पार न पावत तौन॥
- ब्रजविलास (रासलीला)

इसी कारण से वह भी अन्य रसिकों की भाँति वृंदावन की रज बनने की ही कामना कर रहे हैं:
बार बार मनाय युग पद, नाथ पद माँगहूँ ।
ह्वैं रहौं वृंदा विपिन रज, तव चरण पंकज लागहूँ ।।
- श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास 
 
श्री ब्रजवासीदास जी के रासलीला वर्णन का दर्शन :
श्री ब्रजवासीदास जी ने रासलीला का अत्यन्त प्रभावपूर्ण एवं मनोहारी वर्णन अपने ब्रज विलास ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध में किया है। रासलीला वर्णन का क्रम श्रीमद्भागवत की रामपंचाध्यायी के क्रम से ही मिलता जुलता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि कथा-क्रम भागवत से पूर्णतः प्रभावित है। जहाँ तक वर्णन शैली का प्रश्न है, वह गोस्वामी तुलसी दास जी द्वारा रचित रामचरितमानस का दोहा-सोरठा-चौपाई-छन्द-शैली के अनुसार ही किया गया है। जिस प्रकार गोस्वामी जी ने रामचरित का वर्णन प्रस्तुत किया है, ठीक वैसे ही श्री ब्रजवासीदास जी ने श्रीकृष्ण चरित्र का वर्णन अपने ब्रजविलास नामक ग्रंथ में किया है। 
श्री ब्रजवासी दास के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी द्वारा वर्णित रासगोपी-कृष्ण के गंधर्व-विवाह की एक पद्धति है। श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के निमित्त ही गोपियों ने जो तप किया था, उसी तप को सार्थक कर चीरहरण-लीला के समय श्रीकृष्ण ने इन्हें वरदान दिया था। 
वेदव्यास जो रास बखानो, सो गंधर्व व्याह विधि जानो।
ब्रज गोपिन हरिहित तप कीन्हों, श्याम होंय पति यह ब्रत लीन्हो॥
- ब्रजविलास
 
अपने इसी दिव्य वरदान को यथार्थ प्रमाणित करने हेतु ही श्रीकृष्ण ने, शरद ऋतु की धवल चन्द्रिका से प्रकाशमान ब्रज यमुना पुलिन पर रासलीला का अलौकिक आयोजन किया था। 
भक्तों के वशीभूत होने वाले उन श्यासुन्दर ने ही शरद की रात्रि में रासलीला को रचकर गोपियों के मध्य अनेक रूपों में अवस्थित होकर उन्हें आनन्दित किया था। श्रीमद्भागवत की भांति ब्रजवासीदास जी ने भी रासलीला के प्रसंग को, यहाँ श्रीकृष्ण के मुरली-वादन से प्रारम्भ किया है। रासलीला का स्मरण होते ही श्रीश्यामसुन्दर ने वन के मध्य मुरली-वादन का प्रारम्भ करते हुए अपनी परम प्रिया एवं गोपियों को आनन्दित किया था। मुरली की उस मधुर एवं दिव्य ध्वनि ने जहां एक ओर समस्त लोकों के देव समाज को विह्वल कर दिया था, वहीं दूसरी ओर साठ हजार ब्रजबालाओं को, समस्त मर्यादाओं से परे होकर अपने परम पति श्रीकृष्ण के पास अविलम्ब प्रस्थान करने के लिए बाध्य कर दिया था। असाधारण बात तो यह थी कि श्रीकृष्ण की प्रत्येक गोपी का नाम मुरली में ही ध्वनित था।
लखि बनसुख समुदाय कन्हाई, हर्षि रास रुचि मन उपजाई।
तब करलई सकल गुण जुरली, ललित योग माया सी मुरली॥
- ब्रजविलास
 
श्रीकृष्ण की मुरली श्रवण करते ही समस्त ब्रजदेवियां यमुना-तट के समीप बन के मध्य मुरलीधर के समक्ष पहुंच गईं। श्यामसुन्दर ने भी मधुर मुस्कान एवं प्रिय वचनों से उनका आदर किया और प्रेम परीक्षार्थ आर्य पथ की मर्यादाओं का उपदेश दिया। किन्तु गोपियां तो श्रीकृष्ण को ही अपना परम पति मानती थीं। वे भला कैसे लौट जातीं? उन्होंने श्रीकृष्ण के उपदेश पर यहां तक कह दिया कि यदि आप हमें नहीं अपनाते तो हम सभी शरीर त्याग करेंगी किन्तु ब्रज लौटकर न जायेंगी।
गृह गुरु जन तजि लाज तजि, ब्रजसुन्दरी निकाय।
मुरली ध्वनि रा रंगी रंगी, मिलीं श्याम बन जाय॥
- ब्रजविलास
 
गोपियों के अनन्य प्रेम की दृढ़ता को देखकर श्रीकृष्ण की कृपा अपने प्रसार हेतु आकुल हो गई, उमंग बलवती हो गई और माधव के नेत्र भी प्रेमाश्रुओं से परिपूर्ण हो गये। श्रीश्यामसुन्दर ने गोपियों के अनन्य प्रेम को सराहा, उनका आलिंगन किया और उनके रासलीला रूपी मनोरथ की पूर्ति हेतु उन्हें यमुना पुलिन की ओर प्रेरित किया। 
विरह विकल लखि गोपिकन, कृपासिंधु भगवान। 
उमंगि उठे दृग भरि लिए, दीन वचन सुनि कान॥
- ब्रजविलास
 
यथार्थतः गोपियों के परम अलौकिक प्रेम के वशीभूत होकर ही, श्रीकृष्ण ने पतिभाव से उपासना करने वाली गोपियों के साथ दिव्य रास-रमणोत्सव को प्रारम्भ किया था। इस रास- रमणोत्सव के निमित्त स्वयं श्यामसुन्दर ब्रजांगनाओं के विराग यूथ के साथ, हर्षोल्लास प्रकट करते हुए यमुना तट पर पहुंच गए। उस समय अत्यन्त उज्जवल एवं कमनीय यमुना तट की रेत इतनी रमणीय प्रतीत होती थी, मानों उसे यमुना जी ने स्वयं अपने हाथ से संवारा हो। इस यमुना तट पर, गोपियों के मध्य रासेश्वर श्रीकृष्ण का हास, विलास, परिरंभन आदि, ब्रजांगनाओं के प्रेम-संवर्द्धन एवं प्रियतम भाव की सार्थकता हेतु परम अलौकिक ढंग से चरितार्थ हो रहा था। श्रीब्रजवासीदास जी की मान्यता के अनुसार श्री राधामाधव की यह दिव्य रासलीला वंशीवट पर आयोजित हुई थी।
हंसत करत बहुरस चरित, युवति वृंद लिए संग। 
गये यमुन तट श्याम तब, क्रीडत कोटि अनंग॥
- ब्रजविलास
 
प्रथमतः यहीं रासेश्वर श्रीकृष्ण ने ब्रजदेवियों के विराट रासमण्डल में प्रत्येक गोपी के मध्य अपने-आपको स्थित किया था। अपनी अलौकिक कला से इस प्रकार वे सब के बीच में होते हुए भी मण्डल के केन्द्र में, प्रियाजी सहित परिलक्षित थे। श्रीकृष्ण की यह कला सबके लिए रहस्यमय हो रही थी। 
भई भूमि कपूरमथरज, वरषि जल कुंकुम सिंची।
परम कोमल सुभग शीतल, ज्योति मणिकंचन खिंची॥
- ब्रजविलास
 
श्रीब्रजवासीदास द्वारा निरूपित इस रासलीला में भी विविध प्रकार का वाद्य-वादन, नूपुरादि की ध्वनि, मुरली का स्वर, मण्डल नृत्य, तथा भावनाट्य तो अभूतपूर्व था ही, साथ ही श्रीकृष्ण की विविध गतियों का भी अनुकरण ब्रजदेवियों द्वारा किया जा रहा था।
नूपुर कंकण किंकिणी बाजैं, मन्द मधुर मुरली सुर गावैं।
नितंत पिय संग संचल बाला, जनुक्रीडत घन दामिनि जाला॥
- ब्रजविलास
 
इस मण्डल रास में कोई गोपी नृत्य-रत थी, कोई बलिहारी-बलिहारी ध्वनि का उच्चारण करती थी, कोई प्रियतम का गुणगान करती थीं, कोई अभिनय से भाव को स्पष्ट करती थी, कोई ताल देती थी, तथा कोई ताल-भेदों को प्रकट करते हुए नृत्य में संलग्न थी। इतना ही नहीं, कोई श्यामसुन्दर के साथ गाती थी और कोई उनसे मुरली छीन कर बजाती भी थी। इसी प्रकार श्यामसुन्दर भी सबको अपना आलिंगन प्रदान कर रासलीला के रस का उत्कर्ष प्रकट करते थे। 
नृत्यत अरस परस पिव प्यारी, बोलत बलिहारी बलिहारी।
कोउ कल ध्वनि पिय के गुण गावै, कोउ अभिनय करि भाव बतावै॥ 
- ब्रजविलास
 
वंशीवट की दिव्य रासलीला के गीत-गायन, नृत्य तथा अभिनय आदि में गोपियां अत्यधिक श्रमित हो गईं, उनके हार इत्यादि टूट गए और वे श्रमविन्दुओं से युक्त होकर आनन्द मग्न हो गई। रासेश्वर ने भी टूटटे हुए हारों को बीच में ही रोक लिया, अपने पीताम्बर से प्रियाओं के श्रम विन्दुओं का निवारण किया। और उन्हें मधुर मधुर वचनों से आनन्दित किया।
भई नितंत थकित तरुणी, रूप गुणन उजागरी।
उमंगि तब उर लाय लीनी, श्यामै लखि नव नागरी॥
- ब्रजविलास
 
ब्रजदेवियों की प्रीति के वशीभूत श्री माधव उस प्रकार जहाँ एक ओर, उन्हें अपनी प्रेमपूर्ण वाणी से प्रसन्न करके गौरव प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके मनोरथ की परितृप्ति हेतु महामंगल रासलीला की अभिलाषा व्यक्त करते हैं। इस महामंगल रासलीला में सभी गोपियों का भाव पूर्ववत हो जाता है, और वे आनन्द में झूम उठती हैं। रासलीला का यही दृश्य यहां पुनः अंकित किया गया है जो प्रथम रासलीला के रूप में पहले दृष्टि गोचर हो चुका है। श्रीब्रजवासीदास जी ने इस रासलीला को रस के राजसूय यज्ञ की संज्ञा प्रदान की है।
रच्यो राज सुयज्ञरस, रास विपिन शुभ धान।
तहं अधिकारी सांवरो, मोहन सुन्दर श्याम॥
- ब्रजविलास
 
इस रासलीला में होड़ा-होड़ी नृत्य तथा भावनाट्य तो परिलक्षित हैं ही, साथ ही रासमण्डल में श्री राधाकृष्ण-युगल के विवाह चरित्र भी अभूतपूर्व रूप में सामने आया है।
तहं नंद नन्दन लाड़िलो, श्रीवृषभानु कुमारि।
दूलह दुलहिनि राज हीं, शोभा अमित अपारि॥
- ब्रजविलास 
 
रासलीलान्तर्गत श्रीयुगल के विवाह दृश्य में सोलह सहस्त्र गोपिकायें सम्मिलित थीं। श्री ब्रजवासीदास जी की मान्यता में इसके उपरान्त ही श्रमित ब्रज बालाओं को रासेश्वर श्रीकृष्ण ने जल विहार कराया था। यहां भी जल विहार को रस रास का एक रूप माना गया है। सोलह सहस्त्र गोपियां इस दिव्य जल विहार में भी उपस्थित थीं। जल विहार में गोपियों के मध्य, श्रीकृष्ण की सभी माधुर्यमयी चेष्टायें दृष्टिगोचर होती हैं, जो गोपियों की परितृप्त एवं प्रीति संवर्द्धन के लिए दिव्य एवं अलौकिक परमानन्द से परिपूर्ण हैं। जल विहार के उपरांत वस्त्र-धारण एवं श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों को विदा करने का प्रसंग भी वर्णित है।
यमुना जल क्रीडत नन्दलाल, सोलह सहस संग ब्रज बाला।
मथि राजत दोउ बह जोरि, दम्पति गौर साँवरी गोरी॥
- ब्रजविलास 
 
श्री ब्रजवासीदास जी का श्री राधा कृष्ण के प्रति प्रेम :
श्री राधा और कृष्ण के प्रथम मिलन का वर्णन करते हुए श्री ब्रजवासीदास ने लिखा है :
है तू कौन महर की जाई ? मैं बेटी वृषभान की। 
- ब्रज-विलास (राधा जू के प्रथम मिलन की लीला)
 
उत्तरोत्तर पारस्परिक क्रीड़ा, नोक-झोंक, लड़ाई ने उनके प्रेम को प्रगाढ़ रूप प्रदान किया। श्री ब्रजवासीदास ने श्री राधा और कृष्ण के प्रति पूज्य भावना अभिव्यक्त की है:
बन्दौ युगल किशोर रूपराशि आनंद घन।
दोऊ चंद चकोर, प्रीति रीति रसवश सदा॥
- ब्रज-विलास (उपोद्घोत)
 
श्री ब्रजवासीदास जी द्वारा उद्धव-गोपी लीला का वर्णन :
कृष्ण के रूप और गुण पर आसक्त समस्त ब्रजवासियों को उनके मथुरागमन ने जितना आघात पहुंचाया था उससे भी अधिक त्रास का अनुभव उन्होंने उद्धव-प्रेषित उपदेश के श्रवण से किया। श्री ब्रजवासीदास के अनुसार गोपियों ने उद्धव के ज्ञानोद्गार को शांत कर उनके हृदय में प्रेम का वपन किया। इस प्रकार श्री ब्रजवासीदास ने ज्ञान के योग साधनात्मक पक्ष का खंडन तथा भक्ति का मंडन किया है। इनकी आस्था प्रेमाभक्ति में रही है जिसका अंकन उन्होंने गोपियों के माध्यम से किया है :
 
उद्धव तुम सो साँच बखाने, प्रेम भक्ति हमरे मन मानें।
हमको भजनानंद पियारो, ब्रह्मानंद सुख कहा विचारों॥
 
रचना :
रासमंच की लीलाओं के लिए ब्रजवासीदास का ब्रजविलास एक महत्त्वपूर्ण रचना है। सूर आदि महात्माओं की वाणी में जो प्रेम-समुद्र तरंगायित हुआ था, ब्रजवासीदास ने उसी समुद्र के चरित्र-रत्नों को 1752 में एकत्रित कर ब्रजविलास में संजो दिया। इनसे पूर्व की तीन शताब्दियों में रासमंचीय लीलाओं की वस्तु नियोजना हेतु यद्यपि स्फुट पद, दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया, कुण्डलिया, छप्पय एवं लोकधुनों पर निर्मित अन्य छन्द अपने प्रभूत रूप में लीला-साहित्य के रचियताओं द्वारा उपलब्ध कराये जा चुके थे, तथापि लीला प्रसंगों की क्रम-बद्ध प्रबन्धना का, विशेषकर ब्रजभाव की लीलाओं के लिये अभी तक लीला-प्रस्तोताओं के सामने अभाव ही था, जिसे ब्रजवासीदास के ब्रजविलास ने दोहा-चौपाई की कडवक-पद्धति में पूरा किया।
द्वादस चौपाई प्रति दोहा। तहँ पुनि एक सोरठा सोहा॥
कहूँ कहूँ सुभ छन्द सुहाई। भाषा सरल न अर्थ दुराई॥
- ब्रजविलास (उपोद्घात)
 
इन्होंने पद रचनाओं में उपलब्ध गन्धर्व गुण (नृत्य-गायन-वादन) सम्पन्न कृष्ण-कथा को क्रम-बद्ध रूप में ही देखना चाहा था, जिसके लिये इन्होंने इस लीला-रस को कथा प्रसंगों की क्रम-बद्धता के रूप में वर्णित किया -
 
मेरे मन अभिलाष, प्रभु प्रेरित ऐसौ भयो।
कहि हों सो रसभाष, क्रम सों कथा प्रसंग॥
- ब्रजविलास (उपोद्घात)
 
ब्रजविलास में कथा-प्रबन्ध का वर्गीकरण लीला विशेष के नाम पर किया गया है और इस प्रकार इस ग्रन्थ के पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध में लगभग अस्सी लीलाओं की नियोजना हुई है। ग्रन्थगत विविध लीला-प्रसंगों में जहाँ रूप छवि के स्थिर चित्रों की सुन्दर नियोजना बन पड़ी है, वहाँ गतिचित्रों की भी कमी नहीं है। ब्रज-ललनाओं के साथ नृत्य करते नटनागर के एक गतिचित्र में कवि की समर्थ तूलिका ने श्याम के मुकुट की लटकन, कुण्डल की हलन, ग्रीवा की चलन और भौंह की मटकन के साथ करों की झटकन तथा पगों की पटकन को भी साकार कर दिया है
 
नचत मानों मोर यूथन, मुकट-लटकन यों फबै।
चलत गति लै नागरिन्ह संग, स्याम नट नागर जबै॥
धरनि पग पटकनि झटकि कर, भौंह मटक न कहि परै।
ग्रीव-चालन हलन-कुंडल, कर जु फेरन मन हरै॥
- ब्रजविलास (रासलीला)