जो पथ रसिक महा मति जानै - चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (57)

जो पथ रसिक महा मति जानै - चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (57)

 जो पथ रसिक महा मति जानै रासेश्वरी जनायौ।
कहैं सुनैं अनुसरैं सुमति नर वांछित सबनै पायौ॥ [1]
कुमतिजु तर्क उठावैं अजहूं दई जिन्हें भरमायौ।
वृन्दावन हित रूप कृपाजनितनि ही के उर भायौ॥ [2]
- चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (57)

रसिकजन जिस पथ को जानते हैं वह रासेश्वरी श्री राधा रानी की अकारण कृपा से ही जानते हैं। जो शुद्ध मन से (अधर्म का त्याग करके) इस मार्ग का श्रवण, कीर्तन एवं अनुसरण करता है, उसे दिव्य प्रेम-रस की प्राप्ति होती है। [1]

दूषित बुद्धि वाले इस प्रेम-पथ पर तर्क करते हैं, भगवान ब्रह्मा ने भी श्री कृष्ण की दिव्य-लीला पर संदेह किया जिसके परिणाम स्वरुप वे भगवान की माया से भ्रमित हो गए थे। चाचा श्री वृन्दावनदास जी कहते हैं "जिस भाग्यशाली पर रसिक भक्तजन कृपा करते हैं उसी के ह्रदय को यह दिव्य प्रेम-पथ भाता है।" [2]