दुर्लभ वृंदा-विपिन है, राख्यौ सब तें गोइ।
तेहि ठाँ पावै रहन क्यौं, भाग-हीन जो होइ॥
- श्री ध्रुवदास, भजन शत (73)
श्री वृन्दावन धाम अत्यंत गोपनीय, दिव्य और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। अतः जो व्यक्ति भक्तिभाव से रहित और अभागा है, वह यहाँ कैसे वास प्राप्त कर सकता है?
तेहि ठाँ पावै रहन क्यौं, भाग-हीन जो होइ॥
- श्री ध्रुवदास, भजन शत (73)
श्री वृन्दावन धाम अत्यंत गोपनीय, दिव्य और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। अतः जो व्यक्ति भक्तिभाव से रहित और अभागा है, वह यहाँ कैसे वास प्राप्त कर सकता है?

