केचित् कुर्वन्ति विष्णोर्भजनमनुदिनं केचन ध्यानयोगाद्यन्ये कर्माणि केचिद्धन-सुत- वनिताद्येषु नित्यं सजन्ति।
श्रीराधाकृष्ण-नित्योन्मद-सुरतकला-रञ्जितोदारकुन्जे प्रेम्णैकान्तेन वृन्दाविपिनमधिवसंस्तेषु कोऽहं न जाने॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (7.44)
कुछ लोग भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, कुछ प्रतिदिन ध्यान एवं योग करते हैं, कुछ वेदों के कर्म-कांड का अनुष्ठान करते हैं, और कुछ केवल पत्नी, बच्चों, धन एवं अन्य पदार्थों में मन को लगाए हुए हैं। किन्तु उनमें कौन सा भाग्यवान् एकांत प्रेमपूर्वक श्रीवृन्दावन-वास करता है जो श्रीराधा-कृष्ण को नित्य उन्मत करने वाली सुरत-कलाओं से रञ्जित उदार-कुज है, उसे मैं नहीं जानता!
श्रीराधाकृष्ण-नित्योन्मद-सुरतकला-रञ्जितोदारकुन्जे प्रेम्णैकान्तेन वृन्दाविपिनमधिवसंस्तेषु कोऽहं न जाने॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (7.44)
कुछ लोग भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, कुछ प्रतिदिन ध्यान एवं योग करते हैं, कुछ वेदों के कर्म-कांड का अनुष्ठान करते हैं, और कुछ केवल पत्नी, बच्चों, धन एवं अन्य पदार्थों में मन को लगाए हुए हैं। किन्तु उनमें कौन सा भाग्यवान् एकांत प्रेमपूर्वक श्रीवृन्दावन-वास करता है जो श्रीराधा-कृष्ण को नित्य उन्मत करने वाली सुरत-कलाओं से रञ्जित उदार-कुज है, उसे मैं नहीं जानता!

