ब्रज में रतन राधिका गोरी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (102)

ब्रज में रतन राधिका गोरी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (102)

(राग सारंग)
ब्रज में रतन राधिका गोरी।
हरि लीनी वृषभानु-भवन तें नंद-सुवन की चोरी॥ [1]
गूथी लर केस हेत कुसुमावलि, अरु सुरंग कचडोरी।
पिय-भुज कंध धरें सोभित मनु घन दामिनि-दुति जोरी॥ [2]
कालिंदी-तट केलि कुलाहल, सघनकुंज बन खोरी।
'कृष्णदास' प्रभु गिरिधर नागर नागरि नवल किसोरी॥ [3]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (102)

गौर वर्ण कांति है जिनकी, ऐसी श्री राधिका जी ही ब्रज की चूड़ामणि हैं, जिन्होंने वृषभानु महल में नंदनंदन श्री कृष्ण के हृदय का हरण कर लिया है। [1]

श्री प्रिया जी की वेणी, विभिन्न वर्णो के पत्र एवं डोरी सहित गूंजा पुष्पों से गुंथी हुई है। श्री कृष्णदास कहते हैं "वे अपने पिय (श्री कृष्ण) के कंधे पर हाथ दिए सुशोभित हैं, मानों घन और दामिनी की जोड़ी ही विराजमान है। [2] 

श्री कृष्ण दास जी कहते हैं कि यमुना तट में, सघन कुंजों के मध्य, नवल नागरी श्री राधा गिरिधल लाल संग केली पारायण हैं । [3]