(राग केदारौ)
रसिक लाल के अंग संग
सुख सेज पौढ़ी भाँमिनी । [1]
सुरत रंग बर चपल अंग - अंग
लज्जित नव घन दाँमिनी ॥ [2]
सुंदरता की रासि किसोरी
नहीं उपमा कौं काँमिनी। [3]
श्रीबीठल विपुल विनोद बिहारी सौं
इहि रस बिलसत जाँमिनी॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (37)
नव-नव आनंद की वृद्धि करती हुई नव-दुलहिनी प्रिया-रसिक प्रियतम के संग शय्या-मदिर में पौढ़ी हुई हैं। [1]
अंग-प्रत्यंग सुरत-रंग में इस प्रकार गतिमान हो रहा है कि नवीन मेघ एवं दामिनी की शोभा इनके समक्ष लज्जा की अनुभूति कर रही है । [2]
सौन्दर्य की राशि किशोरी-प्रिया की अतुल शोभा की समता त्रिभुवन में कोई ऐसी कामिनी नहीं, जो कर सके। [3]
श्रीलाल से विपुल विनोद का विस्तार करती हुई प्रिया ऐसी सौन्दर्य-अभिमंडित यामिनी में इस नित्य विहार रस को विलस रही हैं। [4]
रसिक लाल के अंग संग
सुख सेज पौढ़ी भाँमिनी । [1]
सुरत रंग बर चपल अंग - अंग
लज्जित नव घन दाँमिनी ॥ [2]
सुंदरता की रासि किसोरी
नहीं उपमा कौं काँमिनी। [3]
श्रीबीठल विपुल विनोद बिहारी सौं
इहि रस बिलसत जाँमिनी॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (37)
नव-नव आनंद की वृद्धि करती हुई नव-दुलहिनी प्रिया-रसिक प्रियतम के संग शय्या-मदिर में पौढ़ी हुई हैं। [1]
अंग-प्रत्यंग सुरत-रंग में इस प्रकार गतिमान हो रहा है कि नवीन मेघ एवं दामिनी की शोभा इनके समक्ष लज्जा की अनुभूति कर रही है । [2]
सौन्दर्य की राशि किशोरी-प्रिया की अतुल शोभा की समता त्रिभुवन में कोई ऐसी कामिनी नहीं, जो कर सके। [3]
श्रीलाल से विपुल विनोद का विस्तार करती हुई प्रिया ऐसी सौन्दर्य-अभिमंडित यामिनी में इस नित्य विहार रस को विलस रही हैं। [4]

