श्री ललितलड़ैती जी की जीवनी 

श्री ललितलड़ैती जी की जीवनी 

परिचय :
श्री ललितलड़ैती जी उन महात्माओं की परम्परा में आते हैं, जिन्होंने रासमंच के लिये लीलाओं को लिख कर रासानुकरण की विधा को समृद्ध किया है। इनका 'दम्पतिविलास' लीला-साहित्य की दृष्टि से एक ऐसा कोश-ग्रन्थ है, जिसमें लीला-सामग्री अपने फुटकर एवं संग्रथित - दोनों रूपों में विद्यमान है। अपने इस ग्रन्थ के अन्त में श्री नारायणस्वामी के प्रति अनन्य श्रद्धा प्रदर्शित कर सम्भवतः ललितलड़ैती जी ने उसी लीला लेखकों की परम्परा का नमन किया है, जिसके साहित्य का मन्थनकर ललितलड़ैती जी ने अपने नये लीला-ग्रन्थ का निर्माण किया था। 
 
जन्म :
आज से 155 वर्ष पूर्व 1847 में पंजाब के शहर डेरागाजी खान् में एक परम वैष्णवकुल नांज्ञा जाति में स्वामी श्री ललितलड़ैती जी का जन्म हुआ। श्री प्रभुदयाल मीत्तल के अनुसार ललितलड़ैती जी डेरागाजीखाँ के निवासी मुंशी टिक्कनलाल के सुपुत्र थे और इनका मूल नाम इन्द्रभानु था। 
 
अध्यात्म जीवन :
श्री ललितलड़ैती जी यथा समय विद्याध्ययन कर श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु के साक्षात् कृपापात्र श्री कृष्णदास गुंजामाली की परम्परा में सिद्ध वैष्णव सन्त गोस्वामी श्रीश्यामदासजी के वंशज श्रीबालमुकुन्दजी गोस्वामी से इन्होंने कृष्ण-मंत्र की दीक्षा ली। थोड़े ही दिन सरकारी नौकरी कर सच्ची सरकार की सेवा में आकृष्ट हो उठे और गृहस्थ, संसार से परम अनासक्त होकर समदर्शी, भजनानन्दी सन्तसेवी महान् विभूति के रूप में सामने आये। श्री ललितलड़ैती जी अभी 10-12 वर्ष के ही होंगे कि ये वृन्दावन पधारे। श्रीनारायण स्वामी आदि अनेक गौड़ीय सन्तों का इन्हें संग प्राप्त हुआ। व्रज की प्राचीन रास मण्डलियों के लीला अनुकरण का दर्शन कर इनमें व्रजभाषा के अद्भुत कवित्व का गुण उच्छलित हो उठा। साथ-साथ चैतन्य परम्परा की लीला-स्मरण पद्धति में ये विभोर रहने लगे। अष्टयाम-लीला में निशिदिन निमग्न रहते और इनके हृदय पटल पर अपने आप व्रज-लीलाओं की स्फूर्ति होने लगी।
 
श्री ललितलड़ैती जी का श्री वृन्दावन से प्रेम :
श्री ललित लड़ैती जी करुण क्रंदन कर कहते हैं 
"हे किशोरी श्री राधा जू, अब देर न कीजिए, मुझे अपने निज महल श्री वृन्दावन की कुञ्ज-निकुंजों का वास एवं महल टहल प्रदान कीजिये। ऐसी कृपा कीजिए कि बंशीवट के तट पर मैं नित्य ही सुंदर जोड़ी [श्यामा श्याम] की केली क्रीड़ा का अवलोकन करूँ। श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि, हे स्वामिनी, मेरे हृदय की आस को अब पूर्ण कर दीजिए। यह तभी सम्भव है जब आप मेरे अपराधों की ओर ध्यान न देते हुए, अपने निज स्वभाव [मृदुता, कृपालता आदि गुणों] की ओर निहारेंगी।"
(राग भैरवी व यमन)
हा हा देर करो न किशोरी।
श्री वृन्दावन वास दीजिए टहल महल नव कुंजन खोरी॥ [1]
बंशीवट तट करत केलि नित अवलोकहुँ सुन्दर वर जोरी ।
ललित लड़ैती आस पुरावो चूक माफ करि लखि निज ओरी॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (7)
 
श्री ललितलड़ैती जी श्री राधारानी से प्रार्थना करते हैं की "हे कुञ्ज विहारिणी, हे गौरांगी श्री वृषभानु दुलारी, मैं आपके चरण पड़ता हूँ, आपके मुख चंद्र के दर्शनों की अभिलाषा है। हे प्यारी, अब और देर करने का अवसर नहीं है, मेरी क्रंदन सुन लीजिये, मुझे ब्रज धाम का वास प्रदान कीजिये, हे भानपुर वाली, मेरे ह्रदय की इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिये।"
(राग खम्माच)
पड़त हौं पैयां कुञ्ज विहारिनी गौरांगी वृषभानु दुलारी।
करुणा स्वांति बून्द हों चातक मुख छबि चन्द चकोरी प्यारी॥
औसर नहीं अवसेर करन को सुन लीजै दरखास्त हमारी।
ललित लड़ैती देहु बास व्रज पुरिवौ आस भानुपुर वारी॥ 
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, पश्चाताप (26)
 
ग्रन्थ रचना :
श्री ललितलड़ैती जी ने "श्री किशोरी करुणा कटाक्ष" ग्रन्थकी रचना 10-11 वर्षकी आयु में की। इसके बाद श्रीस्वामी जी ने श्रीदम्पति विलास वृहद काव्य ग्रन्थ की रचना की। 
श्रीस्वामीजी ने (दोहावली) 'श्रीरासपंचाध्यायी’, ‘श्रीसनातनधर्मरक्षाव्याख्यान माला' तथा 'श्रीअद्वैतामृतवर्षिणी' इन तीन और बृहद्ग्रन्थों का प्रणयन किया और प्रकाशित कर अनेक अधिकारियों में निशुल्क वितरण भी किया। 
प्रस्तुत ग्रन्थ के अवलोकन मनन करने से जहाँ श्रीस्वामीजी के अलौकिक भक्तिमय व्यक्तित्व का हमें परिचय मिलता है, वहाँ व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की बाल्य, पौगण्ड एवं कौमार रस की उज्ज्वल रसमयी लीलाओं का साक्षात् दर्शन होता है। विभिन्न नायिकाओं की स्वरूपानुबन्धि-लीलाओं का, छद्म तथा निकुंज लीलाओंका अत्यन्त सरस सजीव चित्रण व्रजरस-रसिकसमाज का जीवातु होकर इसमें विकसित हुआ है। 
अष्टयाम-लीला स्मरण में नित्य तथा नैमित्तिक लीलाओं की स्मरण मणियाँ वर्षोत्सवों की श्रृंखला में पिरोई गयी हैं। हर पद का राग-रागिनियों में नामकरण कर श्रीस्वामी जी ने एक संगीताचार्य रूप में रासानुकरण कारी रासमण्डलियों को तथा कृष्णलीला-गायक रसिक-भक्तों के शास्त्रीय संगीत पथ को सहज-सुगम रूप से पुष्पान्वित कर दिया है। व्रजभाव, विशेषतः गोपीभावानुगत्य में स्मरण-साधना-शील साधकों के लिये यह अनुपम रत्न है।
प्राचीन वाणी-ग्रन्थों की भाव-छाया के आधार पर निर्मित श्री ललितलड़ैती जी का 'दम्पतिविलास' पाँच भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में विनय, सिद्धान्त एवं ब्रजलीलाएं वर्णित हैं। द्वितीय भाग होली, वसन्त, हिण्डोल, साँझी और रास आदि ऋतुपरक लीलाओं से सम्बद्ध है। तृतीय भाग में प्रिया-प्रियतम की छद्म-लीलाएं हैं और चतुर्थ भाग उनकी शयन लीलाओं का समुच्चय है। ग्रन्थ के पंचम भाग में चेतावनी विषयक पदों को समाहित किया गया है। ब्रजभाषा-गद्य-वार्तिकों की सुन्दर नियोजना भी ग्रन्थभाग में अत्यन्त दर्शनीय है, जो सम्भवतः लीलाओं की मंचस्थ आवश्यकता को दृष्टिगत करके ही की गयी प्रतीत होती है। 
श्री ललितलड़ैती जी की साँवरी-छद्म-झूलनलीला से एक गद्य-वार्तिक उद्धृत है -
 
'जब पैंग कछु तरल भये, श्रीजी ने श्रीलालजी सों कही - "है प्यारे। इतनी रमक न बढ़ावौ, नेक संभार के झोका देओ।"
यह सुनि आप धीरे-धीरे झुलायवे लगे। कछु देर पीछे फिर पेंग बढ़ गये, तब श्रीजी ने एक संग रिस है कैं भृकुटी चढ़ाय लईं। लालजी तौ डरपे और लता की ओट ते है कैं निकसि दूरि चले गये। सखीजन श्रीजी कों मनाय कैं झुलायवे लगीं। इतनें में श्रीलालजी हू नवनागरी कौ भेष धारि पुनि वाही ठौर चले आये।
 
इनके छद्म परम्परानुमोदित हैं, फिर भी यहाँ मौलिकता का अभाव नहीं है। इनकी एक लीला में सखियाँ कृष्ण के प्रति उपालम्भ प्रकट करने नन्द-भवन में यशोदा के पास जाना चाहती है, परन्तु वे शंकालु हैं कि यशोदा इनके वृत्तान्त पर कैसे विश्वास करेगी। इसके लिये ललितलड़ैती जी की मौलिक उद्भावना कृष्णवेष में राधा को ही दोषी के रूप में उनके साथ भेज देती है-
स्याम रूप धरि लीनों प्यारी।
मोर-मुकुट कटि सोहै काछिनी, पीताम्बर को दमकन न्यारी॥
नख-सिख कियौ सिंगार मनोहर, जाहि देखि हुलसत हिय भारी। 
ललितलड़ैती वाही भेष सों, संग सखी नन्द-भवन सिधारी॥