जन दुःखहरनी धरैनी यति ध्यावें तोहि - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (51)

जन दुःखहरनी धरैनी यति ध्यावें तोहि - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (51)

(कवित्त)
जन दुःखहरनी धरैनी यति ध्यावें तोहि ,
तेरी जग कर्नी विधि बर्नी बड़े स्यान की। [1]
चिन्ता कैसो घेरा मन ढेरा सौ भ्रमत फिरै ,
हृदै नहीं डेरा सुधि खान की न पान की॥ [2]
ध्यावत बनै न मोहि तेरोई कहावत हौं ,
हठी पै कृपा की कोर राखि दया दान की। [3]
औगुन भरोरी हौं कहत कर जोर अब ,
मोरी पच्छ कर तू किसोरी वृषभान की॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (51)

हे जीवों के दुःख हरने वाली, सब संतगण आपका ही ध्यान करते हैं, आपकी लीलाओं एवं महिमा का वर्णन ब्रह्मा जी ने भी किया है। [1]

मेरा मन चिंताओं से घिर कर जगह-जगह आकुलतापूर्वक भ्रमण कर रहा है। मेरे ह्रदय को न खाने की सुधि है, न पीने की। [2]

हे किशोरी जी, मैं आपका ही कहाता हूँ, लेकिन आपका ध्यान मुझसे नहीं बन रहा। दया कर मुझपर अपनी कृपा की कोर रखिए। [3]

श्री हठी जी कहते हैं कि हे विषभानु किशोरी, मैं अवगुणों से भरा हुआ हूँ, लेकिन आपसे दोनों हाथों को जोड़कर विनती करता हूँ कि मुझ पर कृपा कीजिये और मेरा पक्ष लेकर मुझे अपनी नित्य सेवा प्रदान कीजिये। [4]