परिचय :
श्री बणीठणी जी की रचना बड़ी सरस है एवं युगल किशोर श्री श्यामाश्याम की लीलाओं से परिपुष्ट है। इन्होने अपने उपास्य श्री राधा कृष्ण के यश का विस्तार किया। ये अपनी रचनाओं में रसिकबिहारी छाप लगाती थीं। कृष्णगढ़ के राजा नागरीदास जी की सेवा में सब त्याग कर वृन्दावन आ गयी थी।
श्री बणीठणी जी, महाराज श्रीनागरीदासजी (कृष्णगढ़ के राजा) की पासवान थीं। ये महाराज के संग ही सेवा में रहा करती थीं। इनकी जन्मभूमि कृष्णगढ़ राज्य में ही होना सम्भव है। कवितासे इनकी मातृभाषा मारवाड़ी (राजपूतानी) ही विदित होती है। जन्म सम्वत् तो अनिश्चित् है; किन्तु परलोक-गमन 1765 आषाढ़ शुक्ल 15 बुधवार है। यह श्री बणीठणी जी की वृंदावन में समाधि पर शिलालेख - रूप में अंकित है। इनकी समाधि उसी स्थान पर है जहाँ महाराज सावंत सिंह जी की समाधि है जो वृंदावन में तमाल वृक्ष की छाया के नीचे दान गली के पास है। लेकिन समय के साथ, वहाँ अब कुछ परिवार रहते हैं, और आस-पास, राजस्थान के कुछ मंदिर स्थित हैं।
कुँज द्वार आगे नीकौ, चौंतरा समाधि जुत,
बीच एक गली भली भाँति सौं लसत है।
वृन्दावन वासी हित-परिकर आवै जाहि,
तिनहिं लखि प्यारौ नित हिय हुलसत है॥
बाल-काल ही सौं सदा, कियौ जो रसिक संग,
ताही कौ प्रभाव यह नैन दरसत है।
बानी रससानी ही सौं जानी मनमानी बात,
नागरी सखी सरूप देखे तरसत है॥
- श्री हित चंद्र लाल गोस्वामी, वृंदावन प्रकाश माला (11)
बीच एक गली भली भाँति सौं लसत है।
वृन्दावन वासी हित-परिकर आवै जाहि,
तिनहिं लखि प्यारौ नित हिय हुलसत है॥
बाल-काल ही सौं सदा, कियौ जो रसिक संग,
ताही कौ प्रभाव यह नैन दरसत है।
बानी रससानी ही सौं जानी मनमानी बात,
नागरी सखी सरूप देखे तरसत है॥
- श्री हित चंद्र लाल गोस्वामी, वृंदावन प्रकाश माला (11)
वृन्दावन वास :
श्री बणीठणी जी महाराज नागरीदास जी की सेवा में रहती थी। इनका ह्रदय भक्ति-भाव से परिपूर्ण था। जब महाराज नागरीदास जी विरक्त होकर वृन्दावन-वास करने लगे, तो श्री बणीठणी जी भी इनके संग ही वृन्दावन-वास करने लगीं और युगल उपासना में तत्पर हुई।
ग्रन्थ रचना :
श्री बणीठणी जी कविता में अपनी छाप 'रसिकबिहारी' रखती थी। इनके पद ब्रजभाषा और राजपूतानी भाषा में हैं और मिश्रित भी। भाव बड़े ही सुन्दर हैं, जैसा कि सच्चे रसिकों की वाणियों में होती हैं, स्वभाविक ही है, क्योंकि पासवान भी वैसेही भक्तप्रवर की ही थी। इनके द्वारा निर्मित कुछ पद उद्धृत किये जाते हैं। ये पद नागरसमुच्चय, जो ज्ञानसागर- छापाखाना बम्बई से प्रकाशित है, उसमें संग्रहीत हैं, जिनकी संख्या 61 हैं -
आज नंदभवन में बधाई बज रही है। आनंद में भरी सब गोपियाँ भवन में आ रही हैं। श्री यशोदा रानी को पुत्र जन्मा है, समस्त गोपियाँ फुले नहीं समा रही हैं। अपने प्राणजीवन श्री श्यामसुंदर को देखकर सभी गोपियाँ आशीष प्रदान कर रही हैं जैसा उनके इस पद में लिखा है:
(राग काफी)
बजै आज नन्दभवन बधाइयाँ।
गहमह आनँद रंगरली अति गोपी सब मिलि आइयाँ॥
महरि यशोमति कैं भयो सुत फूली अंग न माइयाँ,
'रसिकविहारी' प्रानजीवन लखि देत अशीश सुहाइयाँ॥
आज महाराज वृषभानु जी को बधाई है। रावल ग्राम में आज भीड़ उमड़ आयी है और सखियाँ बधाई गा रही हैं। गोपीजन एक-दूसरे से अति-आनंद में भरकर हंस-हंस कर मिल रही हैं। गोकुल में श्री रसिकबिहारी प्रगट हुए हैं और यहाँ श्री प्यारी जू।
आज वृषभान कै बधाई।
गहमह भीर भई रावलमें गावत अली सुहाई॥
हँसि-हँसि गोपी मिलत परस्पर आनंद उर न समाई।
प्रगट भए उत 'रसिकविहारी' इत प्यारी निधि आई॥
आज सखियाँ एक दूसरे से मिलकर बधाई दे रहीं हैं। वृषभानु-भवन में भक्तों की भीड़ आयी है, महारानी कीरति को पुत्री जन्मी है। गोपीजन अपने घरों से मंगल गीत गाते हुए आ रही हैं। श्री रसिकबिहारी जू के ह्रदय का प्रेम ही श्री राधा के रूप में प्रगट हुआ है।
बधावणों हे हेली ! आज रली।
भई भीर वृषभान-भवनमें कीरति वेलि फली॥
युवती- वृन्द सकल घर घरते मंगल गावत आत चली।
'रसिकविहारी' चंद हेत जनु प्रगटी कुमुद - कली॥
हे सखियाँ, आज बरसाने में मंगल ही मंगल है। श्री किशोरी जू का जन्म हुआ है एवं घर-घर बधाई बज रही है। नगर के चौक मोतियों से जड़ी है, सब मिलकर आशीष दे रहे हैं। श्री रसिकबिहारी जू की जीवन-प्राण श्री राधा सबको सुख प्रदान करने के लिए प्रगट हुई हैं।
(राग सोरठ)
आज बरसाने मंगल माई।
कुँवरि ललीको जनम भयो है घर-घर बजत बधाई॥
मोतिन चौक पुरावो गावो देहु अशीश सुहाई।
'रसिकविहारी' की यह जीवनि प्रगट भई सुखदाई॥
हे सखियाँ, आज महाराज वृषभानु के धाम, बरसाने में बधाई है। ब्रज की गोपियाँ सिर पर मंगल कलश रखकर मंगल गाते हुए महल आ रही हैं। महारानी कीरति के घर सौंदर्य की राशि प्रगट हुई है। ये श्री रसिकबिहारी जू की ह्रदय सर्वस्व हैं, जिनका नाम श्री राधा है।
(राग नायकी)
आज वधावो वृषभानके धाम।
मंगल-कलस लिये आवत गावत ब्रजकी वाम॥
कीरतिके कीरति प्रगटी हैं रूप धरैं अभिराम।
'रसिकविहारी' की यह जोरी होनी राधा नाम॥
आज तो रस भरी रंगीन रात्री है, रंग भरी दुल्हन है और रंग भरे पिय श्याम सुंदर, आप दोनों मिलकर वृंदावन के कुंजों में पधारो । रंग भरी ही सेज सजायी है जहां दिव्य सुंदर रंग भर हुआ है जिसे देख कर कामदेव भी उल्लसित है । श्री बनी ठनी जी कामना करती हैं कि श्री बिहारी एवं प्यारी [श्यामा श्याम] दोनों मिल कर इस रात्री को और रंगीन बना कर सुख चैन प्राप्त करो ।
कुंज पधारो रंग-भरी रैन ।
रंग भरी दुलहिन रँग भरे पिया श्याम सुंदर सुख दैन॥
रंग भरी सेज रची जहाँ सुंदर रंग भर्यो उलहत मैन ।
‘रसिक बिहारी’ प्यारी मिलि दोउ करौ रंग सुख-चैन॥
आज तो रस भरी रंगीन रात्री है, रंग भरी दुल्हन है और रंग भरे पिय श्याम सुंदर, आप दोनों मिलकर वृंदावन के कुंजों में पधारो । रंग भरी ही सेज सजायी है जहां दिव्य सुंदर रंग भर हुआ है जिसे देख कर कामदेव भी उल्लसित है । श्री बनी ठनी जी कामना करती हैं कि श्री बिहारी एवं प्यारी [श्यामा श्याम] दोनों मिल कर इस रात्री को और रंगीन बना कर सुख चैन प्राप्त करो ।
कुंज पधारो रंग-भरी रैन ।
रंग भरी दुलहिन रँग भरे पिया श्याम सुंदर सुख दैन॥
रंग भरी सेज रची जहाँ सुंदर रंग भर्यो उलहत मैन ।
‘रसिक बिहारी’ प्यारी मिलि दोउ करौ रंग सुख-चैन॥

