प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ - श्री घनानंद जी

प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ - श्री घनानंद जी

प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ,
कैसें रहें प्रान जो अनखि अरसायहौ। [1]
तुम तौ उदार दीन हीन आनि पर्यो द्वार,
सुनिये पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ॥ [2]
चातिक है रावरौ, अनोखो मोह आवरो,
सुजान रूप बावरो, बदन दरसायहौ। [3]
बिरह नसाय, दया हिय मैं बसाय,
आय हाय ! कब आनन्द को घन बरसायहौ॥ [4]

- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (24)

हे मेरे प्रेम के आधार, मुझे सुजान प्रियतम श्री श्याम सुंदर! तुम ही बताओ, यदि तुम ही मुझसे रूठकर आलस्य दिखाओगे [मिलने से हिचकिचाओगे] तो फिर मेरे प्राण किस प्रकार रहेंगे? [1]

मैं सब प्रकार से दीन हीन हूँ और एक मात्र तुम्हारे द्वार पर आकर पड़ गया हूँ। हे श्याम! तुम परम उदार हो। इस प्रकार मुझे कब तक तरसाओगे? [2]

मैं तो तुम्हारे लिए चातक (प्रेमी) हूँ और अद्भुत मोह से आवृत्त (अथवा व्याकुल) होकर सुजान के (आपके) सौन्दर्य पर पागल हो रहा हूँ। तुम मुझे अपना मुख कब दिखलाओगे? [3]

तुम अपने हृदय में दया बसा कर, मेरे पास आकर मेरे विरह (दुःख) को नष्ट करके कब आनन्द के मेघ को बरसाओगे? [4]