परम दयाल स्वामिनि मोरी - श्री सरस माधुरी जी

परम दयाल स्वामिनि मोरी - श्री सरस माधुरी जी

 परम दयाल स्वामिनि मोरी।
श्रीवृषभान भवन कुल भूषण, कीरति कुँवरि शरण में तोरी॥ [1]
अहो लड़ैती दया दृष्टि कर, नेक चितौ करुना की कोरी।
गुण निधान प्यारी प्रीयतम की, परम प्रवीन तोऊ अति भोरी॥ [2]
रहूँ हजूर रावरी निशिदिन, सेवा करूँ निकुंजन ठोरी।
हुलसि हुलसि गाउँ गुन तेरे, निरखूं युगल भाँवती जोरी॥ [3]
रूप रसामृत पाय मगन मन, छकी रहूँ या रस में बोरी।
दुलराऊँ दिन दुलह दुलहिन, जीवन प्राण किशोर किशोरी॥ [4]
लाख-लाख अभिलाषा यही है, मागौं विविध निहोर निहोरी।
'सरस माधुरी' दरस भिखारिन, दोउ कर जोर पसारत झोरी॥ [5]

- श्री सरस माधुरी जी

मेरी स्वामिनी श्री राधा परम दयालु हैं। हे श्री वृषभानु जी के महल की कुल-भूषण, हे कीरति कुंवरि, मैं आपकी शरण में हूँ। [1]

हे लाड़िली, मुझपर दया की दृष्टि कीजिये, एक-बार मेरी ओर करुणा की कोर कीजिये। हे गुण निधान, आप श्री लाल जू की प्राण-प्यारी हैं, आप परम प्रवीण हैं फिरभी अति भोरी हैं। [2]

ऐसी कृपा हो कि निकुंज में निशिदिन मैं आपके चरणों में उपस्थित हो आपकी सेवा करूँ । मैं हुलस-हुलस कर आपके गुणों का गान करूँ और श्री लाल जी के संग आपकी दिव्य छवि को निहारूँ । [3]

हे किशोरी जी, मेरा मन आपके रूप रसामृत का पान कर प्रसन्नता से भरा रहे और मैं नित्य इसी दिव्य रस में डूबी इस रस का पान करती रहूँ । मैं नित्य ही दूल्हा दुल्हन [श्री राधा कृष्ण] को दुलार कर लाड़ लड़ाता रहूँ क्यूँकि मेरे प्राण किशोर किशोरी हैं । [4]

श्री सरस माधुरी जी कहते हैं "हे श्री राधा, मैं आपके दर्शनों की भिखारिन हूँ, मैं अपने दोनों हाथों को जोड़कर अपनी झोली पसार कर यही मांगता हूँ कि मैं नित्य आपकी सुन्दर लीलाओं का अवलोकन करता रहूँ " । [5]