नवल कुण्ड एवं अप्सरा कुण्ड, गोवर्धन

नवल कुण्ड एवं अप्सरा कुण्ड, गोवर्धन

नवल कुंड पूर्व में पूँछरी के निकट होने से 'पूँछ कुण्ड' नाम से जाना जाता था, परन्तु भरतपुर की महारानी नवल के द्वारा इसे 'नवल कुण्ड' की संज्ञा दी गई। वैसे नित्य नवल नन्दनन्दन का कुण्ड होने से भी यह नवल कुण्ड है।
नवल कुंड के समीप ही अप्सरा कुंड है। इस स्थान पर परम सुन्दरी रमणीय अप्सराओं ने नृत्य किया, जिससे इस सरोवर का नाम ‘अप्सरा कुण्ड’ पड़ा।
 
तत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयो गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः।
जगुर्यशो लोकमलापहं हरेः सुराङ्गनाः संननृतुर्मुदान्विताः॥
- श्रीमद्भागवतम् (10/27/24)
"तुम्बुरु, नारद और अन्य गंधर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण के साथ, भगवान हरि की महिमा गान करने के लिए आए, जो पूरे विश्व को पवित्र करनेवाला है। और देवताओं की पत्नियाँ आनन्द से भरकर प्रभु के सम्मान में एक साथ नृत्य करने लगीं।"

कई वैष्णव मानते हैं कि अप्सरा कुंड का नाम श्री राधारानी के नाम पर रखा गया है। 
दोनों सरोवरों के पास सघन कुञ्जों व कदम्ब वृक्षों से आच्छादित रासस्थली है। इन्हीं सरोवरों के निकट अप्सराविहारी मन्दिर, कुण्डेश्वर महादेव मन्दिर तथा राघवपंडित की गुफा है, जिसमें वे भजनाविष्ट हुये थे और उनके पश्चात् सिद्ध संत पंडित रामकृष्ण दास बाबा ने भी यहिं भजन किया था।
 
स्थान :
नवल कुण्ड एवं अप्सरा कुण्ड पूँछरी, गोवर्धन में स्थित हैं।