पादाब्जयोस्तव विना वर - दास्यमेव नान्यत्कदापि समये किल देवि याचे।
सख्याय ते मम नमोऽस्तु नमोऽस्तु नित्यं दास्याय ते मम रसोऽस्तु रसोऽस्तु सत्यम्॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (16)
हे दिव्य-क्रीड़ा परायणा स्वामिनि ! आपके चरण-कमलों के सर्वश्रेष्ठ दास्य को छोड़कर मैं कभी भी अन्य किसी (सख्यादि) भाव की प्रार्थना नहीं करती हूँ। आपके सखीत्व को मैं नित्य बार-बार नमस्कार करती हूँ। आपके दास्य में ही मेरा अनुराग हो, यह मैं सत्य कह रही हूँ।
सख्याय ते मम नमोऽस्तु नमोऽस्तु नित्यं दास्याय ते मम रसोऽस्तु रसोऽस्तु सत्यम्॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (16)
हे दिव्य-क्रीड़ा परायणा स्वामिनि ! आपके चरण-कमलों के सर्वश्रेष्ठ दास्य को छोड़कर मैं कभी भी अन्य किसी (सख्यादि) भाव की प्रार्थना नहीं करती हूँ। आपके सखीत्व को मैं नित्य बार-बार नमस्कार करती हूँ। आपके दास्य में ही मेरा अनुराग हो, यह मैं सत्य कह रही हूँ।

