निरस्तसाम्येन च साम्य कल्पनात्वदीय रूपेण विमोहमात्रकम्।
एकात्वमेवासि महत्तमान्तरे विमृग्यरूपा श्रुतिभिर्निबोधिता॥
- श्री वंशी अली, श्री राधा स्तोत्र (14)
श्री राधा की तुलना किसी से करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है [चाहे कोई कितना ही महान क्यूँ न हो] क्यूँकि श्री राधा तो ‘निरस्तसाम्य’ [समता रहित] हैं । उनके समान किसी को रखना या उनसे किसी की तुलना करना ही अपनी घोर मूर्खता का परिचय देना है । श्रुतियों के द्वारा भी जिस श्री राधा को ‘विमृग्यरूपा’ बताया गया है अर्थात् श्रुतियाँ भी आज तक उन्हें खोज रही हैं परंतु उनका पार नहीं पा सकी ।
एकात्वमेवासि महत्तमान्तरे विमृग्यरूपा श्रुतिभिर्निबोधिता॥
- श्री वंशी अली, श्री राधा स्तोत्र (14)
श्री राधा की तुलना किसी से करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है [चाहे कोई कितना ही महान क्यूँ न हो] क्यूँकि श्री राधा तो ‘निरस्तसाम्य’ [समता रहित] हैं । उनके समान किसी को रखना या उनसे किसी की तुलना करना ही अपनी घोर मूर्खता का परिचय देना है । श्रुतियों के द्वारा भी जिस श्री राधा को ‘विमृग्यरूपा’ बताया गया है अर्थात् श्रुतियाँ भी आज तक उन्हें खोज रही हैं परंतु उनका पार नहीं पा सकी ।

