आयौ बसंत मदन दल साजे - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (50)

आयौ बसंत मदन दल साजे - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (50)

आयौ बसंत मदन दल साजे दुहुँ दिसि ह्वै गई भीर।
अबीर गुलाल उड़त नैंननि सों रस बिबस बिसरि गये चीर॥ [1]
खेलत हँसत हँसावत सब मिलि धरत नहीं मन धीर।
श्री ललितमोहिनी को सुख बाढ्यौ धन्य आजु दिन बीर॥ [2]

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (50)

बसन्त आ गया है। कामदेव ने अपने दल सजा लिए हैं। (प्रिया-प्रियतम) दोनों की ओर ( नई-नई आकाङ्क्षाओं और अभिलाषाओं की ) भीड़ लग गई है । दोनों के नेत्रों से अबीर और गुलाल उड़ने लगे हैं । ( नयनों में रची-बसी पारस्परिक रस-रीझ का रंग एक दूसरे पर चढ़ने लगा है। ( ये दोनों आनन्द में इतने विभोर हो रहे हैं कि इन्हें अपने वस्त्रों की सार-संभाल तक का अनुसन्धान नहीं रहा है । [1]

दोनों परस्पर मिल-भेंट कर हँसते-खेलते सखियों को आनन्दित कर रहे हैं। कोई भी मन में धैर्य धारण करने में सक्षम नहीं है । श्रीललितमोहिनी जी कहती हैं कि "है सखी, आज का दिन धन्य है !" [2]