मैं तो हूँ मलीन, छबि छीन, अति दीन महा ,
पातकी हूँ, कौन विधि पातक नसाओगे। [1]
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मन्दता, अविद्या आदि ,
औगुण अनेक भरे, काहलौं गिनाओगे॥ [2]
गर्भ के गड़ेला बीच, जड़ता के जाल बीच ,
भ्रमता के भँवर बीच, कब लौं भ्रमाओगे। [3]
एहौ करूणा निधान! श्रीबिहारी और बिहारिन जू ,
स्वामी हरिदास मौहे कब अपनाओगे॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
हे श्यामा श्याम, मैं तो अत्यंत मलीन हूँ, अभियुक्त एवं अति दीन हीन हूँ, मैं पातकी हूँ, मेरे पापों का नाश आप किस विधि करोगे? [1]
पातकी हूँ, कौन विधि पातक नसाओगे। [1]
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मन्दता, अविद्या आदि ,
औगुण अनेक भरे, काहलौं गिनाओगे॥ [2]
गर्भ के गड़ेला बीच, जड़ता के जाल बीच ,
भ्रमता के भँवर बीच, कब लौं भ्रमाओगे। [3]
एहौ करूणा निधान! श्रीबिहारी और बिहारिन जू ,
स्वामी हरिदास मौहे कब अपनाओगे॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
हे श्यामा श्याम, मैं तो अत्यंत मलीन हूँ, अभियुक्त एवं अति दीन हीन हूँ, मैं पातकी हूँ, मेरे पापों का नाश आप किस विधि करोगे? [1]
मेरे मन में काम, क्रोध, मोह, मन्दता, अविद्या आदि भरे हुए हैं। मेरे में अनंत अवगुण हैं कि कहाँ तक उसकी गिनती की जा सकती है? [2]
मैं तो घोर संसारी की भाँति जो गर्भ के चक्कर एवं जड़ता के जाल के बीच में फँस फँस कर भ्रमता से युक्त यहाँ वहाँ भँवरे की तरह संसारी विषयों में ही कब से मंडरा रहा हूँ, ऐसा कब तक चलेगा? [3]
अहो करूणा निधान, श्री बिहारी बिहारिनी जू एवं स्वामी श्री हरिदास जी, कब आप मुझे अपनाओगे? [4]

