रे मन नवल निकुंज की, सुमिर सोहनी प्रात ।
लपटी प्यारी चरण रज, लसत सहचरी हाथ ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.1)
हे मेरे मन! तू प्रातःकाल नवल-निकुंज की उस सोहनी का स्मरण कर, जिसने अपने आपको श्री प्रियाजी के चरणों की रज से लपेट रखा है और जो किसी सहचरी के हाथ में स्थित है।
लपटी प्यारी चरण रज, लसत सहचरी हाथ ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.1)
हे मेरे मन! तू प्रातःकाल नवल-निकुंज की उस सोहनी का स्मरण कर, जिसने अपने आपको श्री प्रियाजी के चरणों की रज से लपेट रखा है और जो किसी सहचरी के हाथ में स्थित है।

