आनँद के घन छैल सों, करि ले चित को चाव ।
इस्कलता जौ चाहिए, तौ बृंदावन आव ॥
- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, इश्क़लता (43)
हे मन! उन आनंद के पुंज, परम रसीले छैल (श्री कृष्ण) से अपने चित्त का चाव (अनुराग) लगा ले। यदि तू प्रेम की वह दिव्य बेल चाहता है जो कभी कुम्हलाती नहीं, तो तू श्री वृन्दावन आ जा, क्योंकि यहीं उस रस की वर्षा होती है।
इस्कलता जौ चाहिए, तौ बृंदावन आव ॥
- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, इश्क़लता (43)
हे मन! उन आनंद के पुंज, परम रसीले छैल (श्री कृष्ण) से अपने चित्त का चाव (अनुराग) लगा ले। यदि तू प्रेम की वह दिव्य बेल चाहता है जो कभी कुम्हलाती नहीं, तो तू श्री वृन्दावन आ जा, क्योंकि यहीं उस रस की वर्षा होती है।

