नैनन सों नैना मिले, मुख सौं मुख लपटाय ।
भुज अरुझे सुरझे नहीं, रहे सुरति सुरझाय ॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (187)
वृन्दावन युगल-रस का परम-पावन स्थान है जहाँ युगल (श्री राधा कृष्ण) प्रेम के वशीभूत होकर नयन से नयन मिलाते, मुख से मुख लगाते और भुजाओं में परस्पर लिपटकर दिव्य प्रेम-रस में निमग्न रहते हैं।
भुज अरुझे सुरझे नहीं, रहे सुरति सुरझाय ॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (187)
वृन्दावन युगल-रस का परम-पावन स्थान है जहाँ युगल (श्री राधा कृष्ण) प्रेम के वशीभूत होकर नयन से नयन मिलाते, मुख से मुख लगाते और भुजाओं में परस्पर लिपटकर दिव्य प्रेम-रस में निमग्न रहते हैं।

