(राग सारंग)
प्रीति करि काहू सुख न लह्यौ ।
प्रीति पतंग करि पावक सौं, आपही प्रान दह्यौ ।। [1]
अलि सुत प्रीति जल सुत सौं, सम्पुट माँझ गह्यौ ।
सारंग प्रीति करी जु नाद सौं, सनमुख बान सह्यौ ।। [2]
हम जौ प्रीति करी माधव सौं, चलत न कछु कह्यौ ।
'सूरदास' प्रभु बिन दुःख पावत, नैनन नीर बह्यौ ।। [3]
- श्री सूरदास
(श्री सूरदास जी के शब्दों में एक ब्रज गोपी कह रही है)
प्रेम करके किसी ने भी सुख नहीं पाया। एक पतंगे ने अग्नि से प्रेम किया और (उसमें गिरकर) अपने प्राणों को जला डाला। [1]
(जन्म से ही) भौंरों ने कमल से प्रेम किया तो (उसने रात्रि में अपने) सम्पुट में (उसे) पकड़ लिया (बंद कर लिया) और वह भौंरा मर गया। इसी प्रकार मृग ने संगीत-ध्वनि से प्रेम किया तो उसे छाती पर बाण सहना पड़ा। [2]
इसी प्रकार हमने जो माधव से प्रेम किया तो जाते समय भी उन्होंने हमसे कुछ कहा नहीं। प्रभु के बिना हम दुःख भोग रही हैं, जिससे हमारे नेत्रों द्वारा आँसू बहते रहते हैं। [3]
प्रीति करि काहू सुख न लह्यौ ।
प्रीति पतंग करि पावक सौं, आपही प्रान दह्यौ ।। [1]
अलि सुत प्रीति जल सुत सौं, सम्पुट माँझ गह्यौ ।
सारंग प्रीति करी जु नाद सौं, सनमुख बान सह्यौ ।। [2]
हम जौ प्रीति करी माधव सौं, चलत न कछु कह्यौ ।
'सूरदास' प्रभु बिन दुःख पावत, नैनन नीर बह्यौ ।। [3]
- श्री सूरदास
(श्री सूरदास जी के शब्दों में एक ब्रज गोपी कह रही है)
प्रेम करके किसी ने भी सुख नहीं पाया। एक पतंगे ने अग्नि से प्रेम किया और (उसमें गिरकर) अपने प्राणों को जला डाला। [1]
(जन्म से ही) भौंरों ने कमल से प्रेम किया तो (उसने रात्रि में अपने) सम्पुट में (उसे) पकड़ लिया (बंद कर लिया) और वह भौंरा मर गया। इसी प्रकार मृग ने संगीत-ध्वनि से प्रेम किया तो उसे छाती पर बाण सहना पड़ा। [2]
इसी प्रकार हमने जो माधव से प्रेम किया तो जाते समय भी उन्होंने हमसे कुछ कहा नहीं। प्रभु के बिना हम दुःख भोग रही हैं, जिससे हमारे नेत्रों द्वारा आँसू बहते रहते हैं। [3]

