राधा नामही सों नातो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (203)

राधा नामही सों नातो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (203)

(राग देस)
राधा नामही सों नातो ।
जाके नाम लेत प्रीतम सों परत प्रीत को खातो ॥ [1]
जो विश्वासै ललितकिशोरी पहिले तं मन लातो ।
होतो कुंज निवास जगत क्यों जनम जनम भरमातो ॥ [2]

- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (203)

हमारा संपूर्ण नाता श्री राधा नाम से ही है जिसके लेने से श्री श्याम सुंदर के प्रति प्रगाढ़ प्रीति उत्पन्न हो जाती है । [1]

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि यदि  ऐसा विश्वास हृदय में पहले हो गया होता तो अब तक जन्म जन्म का भ्रमण खत्म हो जाता एवं निकुंजों में निवास हो गया होता । [2]