श्री राधेरानी, दे डारो ना वाँसुरी मोरी - श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (33)

श्री राधेरानी, दे डारो ना वाँसुरी मोरी - श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (33)

श्री राधेरानी, दे डारो ना वाँसुरी मोरी।
जा वंसी में मेरो प्राण वसत है, सो वंसी गयी चोरी ॥ [1]
सोने की नाँही, कान्हा, रूपे की नाँही हरे बाँस की पोरी ।
काहे से गाऊँ, राधे, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैयाँ घेरी ॥ [2]
मुख से गावो, प्यारे ताल से बजावो लकुटिया में लावो गैयाँ घेरी ।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, हरि चरणन की चेरी ॥ [3]

- श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (33)

श्री श्याम सुंदर श्री प्रिया जी से प्रार्थना कर रहे हैं: हे राधा रानी, मेरी बांसुरी मुझे लौटा दो ना ? इस वंशी में मेरे प्राण बसे हैं जो अब चोरी हो गई है । [1]

यह वंशी न तो सोने की है, न चाँदी की, यह तो हरे बांस की बनी है । आप ही बताओ राधे, मैं कैसे गाऊँ, कैसे बजाऊँ, और गैया को कैसे घेर कर वापस लाऊँ ? [2]

श्री प्रिया जी कहती हैं कि हे प्यारे, अपने मुख से गाओ, अपने हाथ से ताली बजाओ, एवं लकुटिया से गैया को घेर का लाओ । श्री चंद्रसखी अपने गुरु बालकृष्ण जी के रूप का स्मरण करते हुए कहते हैं कि मैं तो श्री हरि के चरणों की दासी हूँ । [3]