स्फीतां गोवर्धनाद्रे: श्रियमियशोभितो वैक्षितुं नेत्रकोटौँ श्रोतुं तस्याय दिव्यां प्रिय गुण गणानां कर्णकोटि तथैव ।
जिह्वाकोटिं तदीयामृतमयचरितं वर्णितुं त्वं विधात पादादीन्द्रिय कोटिं निज निज विभयान सेवितुं में प्रयच्छ ।।
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (76)
गोवर्धन की मनोहर शोभा के दर्शनार्थ कोटि नेत्र, गुणों को श्रवण करने के लिए कोटि कर्ण, उसके अमृतमय चरित्र गायन को कोटि जिह्वा तथा उसकी परिक्रमा के लिए कोटि चरणों की आवश्यकता है ।
जिह्वाकोटिं तदीयामृतमयचरितं वर्णितुं त्वं विधात पादादीन्द्रिय कोटिं निज निज विभयान सेवितुं में प्रयच्छ ।।
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (76)
गोवर्धन की मनोहर शोभा के दर्शनार्थ कोटि नेत्र, गुणों को श्रवण करने के लिए कोटि कर्ण, उसके अमृतमय चरित्र गायन को कोटि जिह्वा तथा उसकी परिक्रमा के लिए कोटि चरणों की आवश्यकता है ।

