(राग मुल्तानी, त्रिताल)
श्रीराधा कृपा पै बलि जईये ।
श्रीवृन्दावन जाय के, राधा-राधा कहिये ॥ [1]
नित-नित डोलो श्रीयमुना तट, नैनन नीर बहइये ।
सर्वस श्रीगोपाल लाड़ली, जैसे राखे रहिये ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (125)
श्री राधा कृपा पर स्वयं को बलिहार कर दीजिए । श्री वृंदावन जाकर नित्य ही “राधा राधा" रटिए । [1]
नित्य नित्य श्री यमुना तट पर डोलिए, एवं नैनों से नीर बहाइए । श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हमारी सर्वस्व श्री लाडिली जी हैं अतः वो जैसे भी रखें वैसे ही रहिए । [2]
श्रीराधा कृपा पै बलि जईये ।
श्रीवृन्दावन जाय के, राधा-राधा कहिये ॥ [1]
नित-नित डोलो श्रीयमुना तट, नैनन नीर बहइये ।
सर्वस श्रीगोपाल लाड़ली, जैसे राखे रहिये ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (125)
श्री राधा कृपा पर स्वयं को बलिहार कर दीजिए । श्री वृंदावन जाकर नित्य ही “राधा राधा" रटिए । [1]
नित्य नित्य श्री यमुना तट पर डोलिए, एवं नैनों से नीर बहाइए । श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हमारी सर्वस्व श्री लाडिली जी हैं अतः वो जैसे भी रखें वैसे ही रहिए । [2]

