लाभ-हानि जानो न कछु, कौन मान-अभिमान ।
बदन कमल-मकरंद रस, करो नैंन-मग पान ॥ [1]
करो नैंन-मग-पान, सुधा अंग-अंग भरयौ जाके।
घूमत रहौं दिन रैंनि, मनौं मादिक मद-छाके ॥ [2]
निरषि निरषि नव रूप, कुंवरि बर बेस किशोरी ।
बढ़त रहे चित चाय चौंप, जयौं त्रषत चकोरी ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (19)
लाभ-हानि, मान-अपमान एवं अभिमान का त्याग कर नित्य ही श्री राधा के वदन कमल के मकरंद रस का नेत्रों से पान करो । [1]
जिनके अंग-अंग में प्रेम सुधा रस भरा हुआ है, उनके अंगों के मकरंद रस का पान कर मादक की भाँति उन्मत्त अवस्था में मदमस्त हो दिन-रात उसी रस में डूबे रहो। [2]
श्री अलबेली अलि कहती हैं कि नित्य नवल किशोरी के नव रूप को निहारते-निहारते चित्त में श्री राधा के लिए प्रेम क्षण-क्षण बढ़ने लगेगा, जैसे चकोर पक्षी चंद्र को देखकर भी तृप्त नहीं होता । [3]
बदन कमल-मकरंद रस, करो नैंन-मग पान ॥ [1]
करो नैंन-मग-पान, सुधा अंग-अंग भरयौ जाके।
घूमत रहौं दिन रैंनि, मनौं मादिक मद-छाके ॥ [2]
निरषि निरषि नव रूप, कुंवरि बर बेस किशोरी ।
बढ़त रहे चित चाय चौंप, जयौं त्रषत चकोरी ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (19)
लाभ-हानि, मान-अपमान एवं अभिमान का त्याग कर नित्य ही श्री राधा के वदन कमल के मकरंद रस का नेत्रों से पान करो । [1]
जिनके अंग-अंग में प्रेम सुधा रस भरा हुआ है, उनके अंगों के मकरंद रस का पान कर मादक की भाँति उन्मत्त अवस्था में मदमस्त हो दिन-रात उसी रस में डूबे रहो। [2]
श्री अलबेली अलि कहती हैं कि नित्य नवल किशोरी के नव रूप को निहारते-निहारते चित्त में श्री राधा के लिए प्रेम क्षण-क्षण बढ़ने लगेगा, जैसे चकोर पक्षी चंद्र को देखकर भी तृप्त नहीं होता । [3]

